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परिवार, सिनेमा, विवाद और 75 साल की जिंदगी… नाना पाटेकर के जीवन का हर पहलू

October 8, 2026 by Uma Shankar

Nana Patekar Story: बहुत कम लोग ही जानते हैं कि नाना पाटेकर के भीतर जो समाज के सबसे लाचार इंसान के लिए तड़प थी, उसकी नींव किसी बॉलीवुड पार्टी या अवॉर्ड सेरेमनी में नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के सुदूर गढ़चिरौली के घने जंगलों में स्थित हेमलकसा में पड़ी थी. नाना पाटेकर विख्यात समाजसेवी बाबा आमटे को पिता समान मानते थे. जब भी वे मुंबई की चकाचौंध से थकते, वे सीधे हेमलकसा पहुंच जाते और वहां डॉ. प्रकाश आमटे और मंदाकिनी आमटे के साथ आदिवासियों के बीच एक-एक महीना एक आम सेवक की तरह गुजारते. नाना के निधन पर डॉ. प्रकाश आमटे के बेटे ने एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में याद किया कि नाना बिना किसी कैमरे, बिना किसी प्रचार के वहां कुष्ठ रोगियों, जंगली जानवरों और उपेक्षित आदिवासियों की सेवा में हाथ बंटाते थे. आगे चलकर उन्होंने डॉ. प्रकाश आमटे की बायोपिक ‘डॉ. प्रकाश बाबा आमटे: द रियल हीरो’ (2014) में मुख्य किरदार भी निभाया. हेमलकसा की उस निस्वार्थ सेवा ने नाना के जेहन में यह बात पत्थर की लकीर की तरह दर्ज कर दी थी कि जिंदगी सिर्फ अपने बच्चों और घर के दायरे में जीने के लिए नहीं होती.

नाना पाटेकर का असली और पूरा नाम विश्वनाथ गजानन पाटेकर था. उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के कस्बे मुरुड-जंजीरा में एक मराठी परिवार में हुआ था. पिता टेक्सटाइल प्रिटिंग का छोटा सा काम करते थे और मां निर्मला पाटेकर एक सीधी-सादी गृहिणी थीं. परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी. नाना जब महज 13 साल के थे, तब एक करीबी रिश्तेदार के धोखे की वजह से उनके पिता का पूरा बिजनेस चौपट हो गया था और परिवार दाने-दाने को मोहताज हो गया. घर चलाने के लिए नाना ने कम उम्र में ही सड़कों पर जेबरा क्रॉसिंग पेंट करने और सिनेमा के पोस्टर चिपकाने का काम किया, जिसके लिए उन्हें महीने के केवल 35 रुपये और एक वक्त का खाना मिलता था. वे मुंबई के जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स में कमर्शियल आर्ट में डिप्लोमा करने पहुंचे. कॉलेज के दिनों में ही उनका झुकाव नुक्कड़ नाटक और मराठी रंगमंच की ओर हुआ. घर और दोस्तों में उन्हें प्यार से ‘नाना’ कहा जाता था. जब वे रंगमंच पर उतरे तो ‘विश्वनाथ’ पीछे छूट गया और नाना नाम भारतीय सिनेमा के इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गया.

अपनों को खोने का वो गहरा घाव

नाना पाटेकर की निजी जिंदगी भारी त्रासदियों से भरी रही. जब वे सिर्फ 28 वर्ष के थे, तब उनके पिता का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. इसके बाद उन्होंने अपने दो सगे भाइयों को भी खो दिया. नाना का विवाह रंगमंच की जानी-मानी कलाकार नीलकांति पाटेकर से हुआ था. दोनों की मुलाकात थिएटर के दौरान हुई थी. शादी के शुरुआती वर्षों में उन्हें सबसे बड़ा सदमा तब लगा जब उनके पहले बेटे दुर्वासा का गंभीर बीमारी के चलते महज ढाई साल की उम्र में निधन हो गया. इस सदमे ने नाना को भीतर से तोड़ दिया. बाद में उनका दूसरा बेटा मल्हार पाटेकर हुआ, जो आज फिल्म प्रोडक्शन और निर्देशन की दुनिया से जुड़ा हुआ है. नाना ने हमेशा अपनी निजी जिंदगी को मीडिया के कैमरों से कोसों दूर रखा, क्योंकि उनका मानना था कि घर के जज्बात अखबारों की सुर्खियां नहीं बनने चाहिए.

Nana Patekar Family

नाना पाटेकर का परिवार

संघर्ष के दिन और पहला ब्रेक

शुरुआती दौर में नाना ने एक ऐड एजेंसी में काम किया और साथ ही मराठी थिएटर में एक्टिंग भी जारी रखी. नाटकों से उनके अभिनय की चर्चा धीरे-धीरे फिल्मों के गलियारों तक पहुंची. साल 1978 में निर्देशक मुजफ्फर अली की फिल्म ‘गमन’ से नाना पाटेकर ने बड़े पर्दे पर कदम रखा. फारूक शेख और स्मिता पाटिल अभिनीत इस फिल्म में नाना का रोल छोटा था, लेकिन उनकी आंखों की चमक और डायलॉग बोलने के अंदाज ने समीक्षकों का ध्यान खींच लिया.

सफर: पांच दशकों का स्वर्णिम काल

  • 1970s-80s: ‘गमन’ के बाद नाना ने मराठी और हिंदी सिनेमा में समानांतर काम किया. मीरा नायर की ऑस्कर-नॉमिनेटेड फिल्म ‘सलाम बॉम्बे!’ (1988) में उनके बाबा के किरदार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वाहवाही लूटी. इसके बाद विधु विनोद चोपड़ा की ‘परिंदा’ (1989) आई, जिसमें गैंगस्टर अन्ना सेठ का रोल करके नाना ने तहलका मचा दिया. इस रोल के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का पहला नेशनल अवॉर्ड मिला.
  • 1990s: नब्बे का दशक नाना पाटेकर के एकछत्र राज का गवाह बना. मेहुल कुमार की ‘क्रांतिवीर’ (1994) में उनके प्रताप नारायण तिलक के किरदार ने इतिहास रच दिया. ‘तिरंगा’, ‘अग्निसाक्षी’ और संजय लीला भंसाली की ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ में मूक-बधिर पिता का रोल निभाकर नाना ने साबित किया कि वे सिर्फ चीखने वाले रोल ही नहीं करते, बल्कि मौन रहकर भी रूह को छू सकते हैं.
  • 2000s: राम गोपाल वर्मा की ‘अब तक छप्पन’ (2004) में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट साधु अगाशे और प्रकाश झा की ‘अपहरण’ में तबरेज आलम बनकर उन्होंने अभिनय का नया पैमाना गढ़ा. वहीं 2007 में अनीस बज्मी की ‘वेलकम’ में डॉन उदय शेट्टी बनकर उन्होंने लोगों को लोटपोट कर दिया.
  • मराठी सिनेमा और आखिरी दौर: महेश मांजरेकर की मराठी फिल्म ‘नटसम्राट’ (2016) नाना के करियर का शिखर मानी जाती है, जिसमें अप्पा बेलवलकर के किरदार में उन्होंने हर देखने वाले को रुला दिया. अपने आखिरी दिनों में वे अनिल शर्मा की फिल्म ‘वनवास’ के साथ शाहिद कपूर की ओ रोमियो और सुबेदार में नजर आए. करीब पांच दशकों के करियर में नाना को 3 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (परिंदा, क्रांतिवीर, अग्निसाक्षी) और 4 फिल्मफेयर अवॉर्ड्स से नवाजा गया.

यादगार फिल्मी किरदार

  • परिंदा (1989 अन्ना सेठ: आग से डरने वाले साइकोटिक गैंगस्टर का रोंगटे खड़े करने वाला अभिनय.
  • क्रांतिवीर (1994) प्रताप तिलक: फांसी के तख्ते पर उनका भाषण आज भी यादगार है.
  • अग्निसाक्षी (1996) विश्वनाथ: एक सनकी, शक्की और खतरनाक पति की भूमिका में खौफ पैदा किया.
  • अब तक छप्पन (2004) साधु अगाशे: बिना किसी मेलोड्रामा के ठंडे दिमाग से गोलियां दागने वाला एनकाउंटर कॉप.
  • वेलकम (2007) उदय शेट्टी: “भगवान का दिया सब कुछ है…” कॉमेडी की क्लासिक टाइमिंग.
  • नटसम्राट (2016) अप्पा बेलवलकर: शेक्सपियर के नाटकों के रिटायर्ड अभिनेता के अकेलेपन और टूटने का जीवंत दस्तावेज.
Nana Patekar Welcome

नाना पाटेकर (वेलकम)

नाना पाटेकर की एक खासियत थी कि वे किसी भी रोल में कभी नाना पाटेकर नहीं लगे, क्योंकि नाना कभी डायलॉग याद करके नहीं बोलते थे. वे उस इंसान के दर्द, उसके सामाजिक बैकग्राउंड और उसकी सांसों की गति को अपने भीतर उतार लेते थे. वे मेथड एक्टिंग की किताबों से नहीं, बल्कि जेबरा क्रॉसिंग की धूप से सीखकर आए थे.

दोस्तों के साथ के किस्से

  • शाहरुख खान: फिल्म ‘राजू बन गया जेंटलमैन’ (1992) के समय शाहरुख इंडस्ट्री में नए थे. नाना ने हमेशा शाहरुख की मेहनत की तारीफ की. शाहरुख भी हमेशा कहते रहे कि नाना जैसे सीनियर एक्टर के साथ स्क्रीन शेयर करना अभिनय की पाठशाला जैसा था. नाना के निधन पर शाहरुख खान ने भावुक होकर उन्हें अपना ‘बड़ा भाई और ‘प्रेरणा’ बताया.
  • इंडस्ट्री के जिगरी यार: अनिल कपूर, जैकी श्रॉफ, मिथुन चक्रवर्ती, डैनी डेन्जोंगपा और दिवंगत ऋषि कपूर उनके सबसे करीबी दोस्त रहे. ‘परिंदा’ में अनिल और नाना का आमना-सामना आज भी कल्ट माना जाता है.
  • डायरेक्टर्स से रिश्ते: नाना सेट पर मनमर्जी करने वाले निर्देशकों को कभी बर्दाश्त नहीं करते थे. विधु विनोद चोपड़ा के साथ ‘परिंदा’ की शूटिंग के दौरान उनका तीखा विवाद हुआ था, लेकिन दोनों एक-दूसरे की प्रतिभा का इतना सम्मान करते थे कि फिल्म पूरी हुई और इतिहास बनी. संजय लीला भंसाली के साथ ‘खामोशी’ के दौरान भी कई क्रिएटिव मतभेद हुए, लेकिन नाना ने भंसाली के विजन को पर्दे पर जीवंत कर दिया.

पत्नी नीलकांति और बेटे मल्हार के साथ रिश्ता

नाना और उनकी पत्नी नीलकांति पाटेकर सालों से अलग रह रहे थे, लेकिन उनके रिश्ते में कभी कोई सार्वजनिक कटुता या कानूनी विवाद नहीं आया. नाना ने खुद इंटरव्यू में कहा था कि वे दोनों अलग मिजाज के इंसान थे, इसलिए आपसी समझदारी से उन्होंने अलग-अलग रहने का फैसला किया. बेटे मल्हार के लिए नाना हमेशा एक दोस्त और मार्गदर्शक रहे. लेकिन नाना ने कभी अपने बेटे के लिए इंडस्ट्री में सिफारिश नहीं की. वे चाहते थे कि मल्हार अपनी जमीन खुद तलाशे. पिता के रूप में नाना बहुत सख्त भी थे और बेहद संवेदनशील भी.

राजनीतिक हलकों में प्रभाव

नाना पाटेकर के रिश्ते बाल ठाकरे से लेकर शरद पवार और देवेंद्र फडणवीस तक, सभी बड़े राजनेताओं से बेहद आत्मीय थे. लेकिन नाना कभी किसी पार्टी का हिस्सा नहीं बने. जब भी किसानों के हक की बात आई, उन्होंने मंचों से आवाज उठाई. राजनेता उनकी आलोचनाओं का बुरा नहीं मानते थे, क्योंकि वे जानते थे कि नाना के दिल में कोई राजनीतिक स्वार्थ नहीं, सिर्फ जनता का दर्द है.

जब वर्दी पहनकर कारगिल पहुंचे नाना

नाना पाटेकर का भारतीय सेना से जुड़ाव किसी भी अन्य सेलिब्रिटी से बिल्कुल अलग था. 1991 में जब उन्होंने फिल्म ‘प्रहार’ (Prahaar) बनाई, तो उन्होंने खुद को तैयार करने के लिए मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ कई महीनों का कड़ा सैन्य और कमांडो प्रशिक्षण लिया. सेना ने उन्हें मानद कैप्टन की रैंक से नवाजा था. असली देशभक्ति 1999 के कारगिल युद्ध (ऑपरेशन विजय) के दौरान देखने को मिली. तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से विशेष अनुमति लेकर नाना पाटेकर सैनिकों का हौसला बढ़ाने सीधे पोस्ट्स पर पहुंच गए थे. उन्होंने माइनस टेम्परेचर में बंकरों में करीब दो महीने जवानों के साथ गुजारे. वे वहां जवानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे थे.

Nana Patekar Army

‘नाम फाउंडेशन’ और किसानों का महा-आंदोलन

साल 2015 में जब महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ में किसानों की आत्महत्याएं चरम पर थीं, तब नाना पाटेकर ने मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘नाम फाउंडेशन’ की नींव रखी.

  • जल संरक्षण: नाम फाउंडेशन ने 1100 किलोमीटर से अधिक लंबी सूखी नहरों और छोटी नदियों की गाद निकलवाई.
  • सीधी मदद: विधवा किसान महिलाओं को आजीविका के साधन दिए, बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाया और सैकड़ों सूखा प्रभावित गांवों को पानी के मामले में आत्मनिर्भर बना दिया.
  • नाना अपनी जेब से किसानों को लाखों रुपये बांटते थे और कभी उसका हिसाब सार्वजनिक नहीं करते थे.

राइफल शूटिंग के नेशनल चैंपियन

नाना पाटेकर सिर्फ रील लाइफ में नहीं, बल्कि रियल लाइफ में भी अचूक निशानेबाज थे. ‘प्रहार’ की ट्रेनिंग के दौरान उनमें शूटिंग का जो शौक जागा, उसे उन्होंने राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया. उन्होंने नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप (300 मीटर बिग बोर राइफल इवेंट) में हिस्सा लिया और साल 2004 में सिल्वर तथा 2007 में महू (इंदौर) में महाराष्ट्र की टीम के साथ ब्रॉन्ज मेडल जीता. उन्हें नेशनल राइफल एसोसिएशन द्वारा ‘रिनोउंड शॉट’ (Renowned Shot) का आधिकारिक दर्जा मिला था. वे अक्सर युवा और गरीब निशानेबाजों को महंगी राइफल्स खरीदकर चुपचाप मदद किया करते थे.

लेखक और निर्देशक नाना

नाना केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि बेहतरीन लेखक और निर्देशक भी थे. 1991 में आई उनकी निर्देशित फिल्म ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ सिस्टम और भ्रष्टाचार पर भारतीय सिनेमा की सबसे बेहतरीन फिल्मों में गिनी जाती है. इसके अलावा वे नाटकों और फिल्मों की पटकथाओं में लगातार इनपुट देते थे.

पुरस्कार और उपलब्धियां

  • पद्म श्री (2013): सिनेमा और कला के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा सम्मानित
  • राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (3 बार) 1990: बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर (परिंदा), 1995: बेस्ट एक्टर (क्रांतिवीर), 1997: बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर (अग्निसाक्षी)
  • फिल्मफेयर अवॉर्ड्स (4 बार): परिंदा, क्रांतिवीर,अंगार, और अपहरण के लिए.
  • महाराष्ट्र राज्य पुरस्कार: रंगमंच और मराठी सिनेमा में अनगिनत सम्मान.

विवाद: जब उठे सवाल

नाना की जिंदगी विवादों से अछूती नहीं रही. साल 2018 में ‘मी टू’ आंदोलन के दौरान अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने 2008 की फिल्म ‘हॉर्न ओके प्लीज’ के सेट पर नाना पर दुर्व्यवहार के आरोप लगाए. इस विवाद ने भारी तूफान खड़ा किया. नाना ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया और पुलिस जांच के बाद सबूतों के अभाव में मुंबई पुलिस ने अदालत में बी-समरी रिपोर्ट दाखिल कर उन्हें इस मामले में क्लीन चिट दे दी. इसके अलावा अपने बेबाक और मुंहफट बयानों के कारण भी नाना कई बार सार्वजनिक बहसों के केंद्र में रहे.

नाना का फलसफा

नाना पाटेकर की छवि बाहर से भले ही गुस्सैल और तीखी रही हो, लेकिन अंदर से वे एक सीधे और फकीर इंसान थे. 80 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति उनके पास थी. 25 साल पहले पुणे के खड़कवासला में 27 एकड़ का फार्महाउस बांधने से पहले नाना मुंबई के अंधेरी स्थित ‘अपना घर सोसाइटी’ में 750 वर्ग फीट के साधारण 1BHK फ्लैट में अपनी मां के साथ रहते थे. मां के निधन के बाद वे कुछ समय तक उसी घर में अकेले रहे, फिर वो उनके फार्म हाउस नानाची वाडी में अपना समय बिताने लगे. वे खुद खेती करते थे, घर में ज्यादातर अकेले रहते थे, दाल-चावल पकाते थे, फर्श पर बैठते थे और अपनी कमाई का लगभग 90% हिस्सा चैरिटी और किसानों की मदद में लगा देते थे. वे अक्सर कहते थे, “जब मेरी जरूरतें सिर्फ दो कुर्ते और दो वक्त की रोटी है, तो बाकी पैसे का घमंड मैं क्यों पालूं?”

Nana Patekar At Farm House

फार्म हाउस पर नाना पाटेकर

नाना के वो अमर डायलॉग जो पीढ़ियों तक गूंजेंगे

  • क्रांतिवीर: “ये मुसलमान का खून, ये हिंदू का खून…बता इसमें मुसलमान का कौन सा, हिंदू का कौन सा? ये खून ऊपरवाले ने बनाया है, हम इसमें मजहब नहीं मिलाते!”
  • वेलकम: “भगवान का दिया हुआ सबकुछ है…दौलत है, शोहरत है, इज्जत है.”
  • अब तक छप्पन: “सिस्टम में रहकर सिस्टम को साफ नहीं किया जा सकता, कभी-कभी कचरा बाहर फेंकने के लिए हाथ गंदे करने पड़ते हैं.”
  • तिरंगा: “हम आंखें देखकर दिल का हाल जान लेते हैं”

नाना की विरासत और आखिरी विदाई

4 अक्टूबर को गोवा के डोना पाउला में आयोजित सम्राट क्लब के कार्यक्रम में जब नाना पाटेकर ने मंच से कहा था—”मैं आज हूं, कल रहूंगा या नहीं, पता नहीं… अगर सिर्फ अपने और परिवार के लिए जीना है तो जी और मर!”, तो किसे पता था कि यह उनके जीवन का आखिरी फलसफा साबित होगा. 8 अक्टूबर की सुबह जब उनके आकस्मिक निधन की खबर आई, तो पूरा देश रो पड़ा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर खेल और सिनेमा जगत की तमाम हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी. नाना अपने पीछे कोई आलीशान साम्राज्य नहीं, बल्कि सूखी नदियों में बहता हुआ पानी, हरे-भरे खेत और एक ऐसा सिनेमाई इतिहास छोड़ गए हैं जिसकी बराबरी कोई दूसरा नहीं कर सकता. वे सचमुच भारतीय सिनेमा के आखिरी ‘नटसम्राट’ थे, जिनकी जिंदगी का सफर महाराष्ट्र के रायगढ़ से शुरू हुआ था और गोवा में उस सफर का अंत हुआ…अलविदा नाना पाटेकर!

About Uma Shankar

Uma Shankar writes about finance, business, and investment topics. He simplifies complex subjects like stock market, banking, tax, and cryptocurrency to help readers make informed financial decisions. Data-driven reporting is his strength.

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