
कई मुर्गों के बांग नहीं देने के बावजूद सूरज उग चुका था. सड़क पर अभी पूरी तरह चहल-पहल नहीं हुई थी पर रोड टैक्स वसूलने वाले आवाजाही शुरू कर चुके थे. गगनचुंबी इमारतों के शीशों ने सूरज की उधार वाली किरणो का प्रकाश अपना बता कर फैलाना शुरू कर दिया था. सड़क पर गाड़ियां थीं, फुटपाथ पर जल्दी में चलते लोग और चौराहे पर खड़ा एक ट्रैफिक पुलिस वाला, जिसे भ्रम था कि शहर का अनुशासन उसकी सीटी पर टिका है. तभी फुटपाथ के एक कोने से सीटी से भी कर्कश आवाज आई- पूंजीवाद मुर्दाबाद!
आवाज इतनी बुलंद थी कि पास से गुजरती एक कार का चालक घबराकर ब्रेक लगा बैठा. उसने शीशा नीचे किया, बाहर देखा और फिर दो शब्द…..वाले कहकर निकल गया. फुटपाथ पर एक-इकलौता लाल झंडा लहरा रहा था. झंडे पर चांद-तारा, हंसिया-हथौड़ा जैसा कुछ बना था. उसे थामे एक आदमी आसमान की और देख के चिल्ला रहा था और अपनी मुट्ठी से हवा में मुक्के चला रहा था. बाल ऐसे बिखरे थे, मानो क्रांति के अंदेशे में मे कंघी पहले ही गिरफ्तार कर ली गई हो.
दाढ़ी बता रही थी की Too much democracy is form of Anarchy का मूर्तिमान होना क्या होता है. बदन पर चे ग्वेरा की तस्वीर वाली टी-शर्ट, गले में लालगमछा, कंधे पर झोला,पैरों में घिसी हुई चप्पलें. और चेहरे का बाजा जोररदार बजा हुआ. वह फिर चिल्लाया—
“मजदूर एकता जिंदाबाद!
मोदी मार्ग मुर्दाबाद!”
दो-चार लोग ठिठककर उसे देखने लगे. एक नौजवान ने मोबाइल निकाला और उसकी तस्वीर खींच ली. क्रांतिकारी ने कैमरा देखा तो मुट्ठी थोड़ी और ऊंची कर दी. आज के जमाने में क्रांति करने से ज्यादा जरूरी है, क्रांति करते हुए दिखाई देना. विचारधारा का पता बाद में चलता है, तस्वीर पहले पहुंच जाती है.
क्रान्ति के इंतजार में मुतरेजा
“मैंने गाड़ी धीमी की. उस चेहरे को पहचानने में मुझे एक पल भी नहीं लगा. अरे यह तो मुतरेजा है. मुझे खबर मिली थी कि आजकल वह सरक गया है. क्रान्ति के इंतजार में वह अकसर चौराहे पर हाथ में डंडा लिए यातायात को नियंत्रित करने में लगा रहता है.पता नहीं दिमाग के सरकने और चौराहे पर ट्रैफिक नियंत्रण का आपस में क्या सम्बन्ध है? अक्सर ऐसी अवस्था में लोग ऐसी चिरकुटई करते पाए जाते हैं.”
“मुझे अचानक लगा कि किसी चिरकुट का चित्रण हो तो बिल्कुल मुतरेजा जैसा ही दिखेगा. चिरकुट कोई खराब शब्द नहीं है. राजनीति में उसे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी ने प्रचलित किया था.” संस्कृत के चिर यानी कपड़ा और कुट्ट यानी टुकड़े से बना है. अलग-अलग इलाकों में इसका अर्थ भी बदल जाता है. कहीं झक्की, कहीं कंजूस और कहीं मंदबुद्धि आदमी. मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत में लिखा है—
“काढ़हु कंथा चिरकुट लावा.
पहिरहु राते दगल सुहावा.”
आप अपने इलाके के हिसाब से चिरकुट का अर्थ लगा लें. मेरे इलाके में मुतरेजा इसका चलता-फिरता उदाहरण है. पर वामपंथी चिरकुट कुछ भिन्न होता है. वह हर उस आदमी का काम लगाता है, जिससे मदद ले चुका होता है, लेता रहता है और लेता रहेगा. जहां भी वामपंथ की मुख्यधारा में आने की संभावना हो, वह लाल झंडा उठा लेता है, चाहें कृतघ्नता की हद तक ही क्यों न जाना पड़े. उसके झोले में ढरे सारी तख्तियां होती हैं. जिसे सुविधानुसार निकाल वह तुरंत धरना, प्रदर्शन करने लगता है.
मुतरेजा के चहरे पर क्रांति की जगह परिचित मुस्कान
“मैंने गाड़ी रोकी. मुतरेजा! यह क्या हो रहा है? वह मेरी आवाज सुनकर पलटा. मुझे देखते ही उसके चेहरे पर क्रांति की जगह परिचित मुस्कान आ गई. झंडे का डंडा कंधे पर टिकाया और तेजी से गाड़ी की तरफ आया.
गुरुदेव, लाल सलाम! अब बहुत हो चुका. अब व्यवस्था बदलनी होगी.
कौन-सी व्यवस्था?”
पूंजीवादी व्यवस्था!. मैं राय साहब को एक्सपोज करूंगा मुतरेजा पर फिर दौरा पड़ा.
“राय साहब मुर्दाबाद”
कौन राय साहब?
“राय साहब ही समस्या की जड़ हैं सर मुतरेजा कान में फुसफुसाकर बोला. बात-बात में पता चला कि राय साहब मुतरेजा के बॉस हैं, जिन्होंने बैंक में उसकी गलत रिपोर्ट दी और उसका लोन रिजेक्ट हो गया. अच्छा! कल तक तुम इसी व्यवस्था में मलाई चांप रहे थे. आज इसे उखाड़ने निकल पड़े. राय साहब के चरण चुम्बक थे. आखिर हुआ क्या?”
बैंक लोन खारिज होने पर क्रांति का झंडा बुलंद
उसने एक गहरी सांस ली. चेहरे पर ऐसा दुख उभरा, जैसे इतिहास ने उसके साथ कोई निजी बेईमानी कर दी हो. “सर, बैंक ने मेरा लोन खारिज कर दिया! मैं कुछ पल उसे देखता रहा. बैंक ने तुम्हारा लोन खारिज किया और तुम पूरी व्यवस्था का बही खाता बंद करने निकल पड़े? और उसमें राय साहब कहां से आ गए? वह तिलमिला गया. आप समझ नहीं रहे हैं. जिसके पास पहले से पैसा है, बैंक उसे और पैसा देता है. जिसके पास नहीं है, उसे उसकी औकात बता देता है. समर्थ को और समर्थ बनाना, यह कैसा न्याय है?”
“मैंने कहा, बात तो ठीक है. आर्थिक असमानता सचमुच एक गंभीर समस्या है. लेकिन अगर बैंक तुम्हारा लोन मंजूर कर देता तो क्या आज भी पूंजीवाद मुर्दाबाद के नारे लगा रहे होते? वह कुछ पल चुप रहा. सर, आप मेरी बात को दूसरी तरफ ले जा रहे हैं. नहीं, मैं तुम्हारी बात के पीछे खड़ा तुम्हारा फायदा देख रहा हूं. व्यवस्था की खामी तब तक खामी नहीं लगती, जब तक उससे हमारा काम चलता रहे. मलाई कटोरी में हो तो व्यवस्था महान है. मलाई छिन जाए तो कटोरी क्रांतिकारी हो जाती है.” सर, अब मुझे लोन नहीं चाहिए. मुझे पूंजीवाद का सफाया चाहिए, ताकि कोई और मुतरेजा इसका शिकार न हो. “मैंने कहा, वाह! अभी तक तुम अपना शिकार ढूंढ रहे थे, अब पूरी मानवता को बचाने निकल पड़े. आदमी को अपना दुख कभी-कभी इतना बड़ा लगता है कि वह उसे पूरी दुनिया का दुख समझ बैठता है.”
“मैं अब वही करूंगा जो भगत सिंह ने किया”
मुतरेजा के इंकलाबी तेवर देखकर मैंने उसे गाड़ी में बैठा लिया. वह झंडा लेकर पिछली सीट पर बैठा तो उसका डंडा मेरी गर्दन के पास आकर अटक गया. इसे संभालकर रखो, “मैंने कहा, तुम्हारा डंडा गलत आदमी की गलत जगह क्रांति ढूंढ रहा है. वह झेंपा, फिर बोला, सर, मजाक मत कीजिए. मैं गंभीर हूं. मैं अब वही करूंगा जो भगत सिंह ने किया. मार्क्स और लेनिन के रास्ते पर चलूंगा. मैं वामपंथ की तरफ जा रहा हूं. मैं समझ गया था कि नया मुल्ला प्याज की तरफ चल पड़ा है. या उसके दिमाग में कुछ केमिकल लोचा हो गया है.”
मुतरेजा चे ग्वेरा से चार्वाक तक आए
सर, आपने ही चार्वाक के बारे में बताया था— यावत् जीवेत् सुखंजीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्. जब तक जियो, सुख से जियो; कर्ज लेकर घी पियो. अब देखिए, बैंक ने कर्ज देने से मना कर दिया. यह व्यवस्था आदमी को सुख से कहां जीने देती है.
मुतरेजा चे ग्वेरा से चार्वाक तक आ गया था. वामपंथ का पहला लक्षण प्रकट हो चुका था. मैं सोचने लगा कि इस वैचारिक दिशा भ्रम का इलाज क्या हो सकता है. वह कुछ देर खिड़की से बाहर देखता रहा. फिर अचानक मेरी तरफ मुड़ा. सर, एक सवाल पूछूं?
“बिल्कुल पूछो. सवाल पूछना वामपंथ का दूसरा लक्षण है.
वह खुश हुआ. और जवाब मिल जाए तो?
जवाब न सुनना तीसरा लक्षण है.”
वह हंस पड़ा. उसे अभी अपने भीतर के इन लक्षणों की गंभीरता का अंदाजा नहीं था. लेकिन सर, एक बात बताइए. अगर वामपंथ इतना बड़ा विचार है तो भारत में उसकी हालत इतनी खराब क्यों है?
“मैंने कहा, जवाब देने से पहले धूमिल की कविता नक्सलबाड़ी याद आ रही है. उसे सुनो. वामपंथ पर तुम्हारी अवधारणा साफ हो जाएगी. सर, घुमाइए मत. मुझे कविता नहीं, जवाब सुनना है.
कविता में ही तुम्हारा जवाब छिपा है, मुतरेजा. मैंने धूमिल की कविता की वे पंक्तियां सुनाईं-
यह एक खुला हुआ सच है कि आदमी—
दाएं हाथ की नैतिकता से
इस कदर मजबूर होता है
कि तमाम उम्र गुजर जाती है
सिर्फ बायां हाथ धोता है.”
क्या वामपंथ खत्म हो गया?
“मुतरेजा सिर खुजाता रहा. शून्य भाव से मुझे देखते हुए बोला, कुछ समझा नहीं, सर, कोई बात नहीं. कविता ने अपना काम कर दिया. अब तुम्हें अपना करना है. वह फिर बोला, तो क्या आप कह रहे हैं कि वामपंथ खत्म हो गया? नहीं ऐसा मैंने कब कहा. सत्ता खत्म होना और विचार का खत्म होना दो अलग बातें हैं. मेरा सवाल तो वामपंथ की सार्थकता पर है. 50 साल में पहली बार ऐसा है कि देश में लेफ्ट की कहीं कोई सरकार नहीं है. कुछ दिन पहले ही केरल में विधानसभा चुनाव और वामपंथ की सरकार दोनों शांतिपूर्ण तरीके से निपट चुके हैं.”
इन मुद्दों पर बराबरी के सवाल उठाए
पहले बंगाल, फिर त्रिपुरा और अब केरल. वामपंथ ने मजदूरों, किसानों, भूमि सुधार, श्रमिक अधिकार और सामाजिक बराबरी के सवाल उठाए हैं. 1957 में केरल में ई.एम.एस.नंबूदरीपाद के नेतृत्व में कम्युनिस्ट सरकार बनी थी. वह लोकतांत्रिक चुनाव के रास्ते सत्ता में आई शुरुआती कम्युनिस्ट सरकारों में से एक थी. ऐसा कह सकते हैं कि नेहरू और कांग्रेस के सामने पहली बार एक सरकार गैर-कांग्रेस धड़े की बनी और इस तरह वोट की ताक़त और लोकतंत्र चुनावी अर्थों में पहली बार स्थापित हुए. लेकिन आज देश में टाइगर से ज्यादा वामपंथी विलुप्ती की कगार पर हैं.
नौजवान वामपंथ की तरफ क्यों आते हैं?
“मुतरेजा ने पूछा, लेकिन, फिर भी नौजवान वामपंथ की तरफ क्यों आते हैं?
क्योंकि असमानता उन्हें परेशान करती है. शोषण देखकर गुस्सा आता है. बराबरी का सपना आकर्षित करता है. जेन-जी के भीतर भी यही आग है. यह अच्छी बात है. बनारस की चाय-पान की दुकानों पर एक बात कही जाती है. बीस की उम्र तक अगर आप वामपंथ की तरफ नहीं गए तो आपके पास दिल नहीं है, और तीस की उम्र में भी आप वामपंथी हैं तो आपके पास दिमाग नहीं है.”
मुतरेजा ने मुंह बनाया. सर, आप हर बात में मेरा मजाक उड़ा देते हैं. आप मुझे मूर्ख समझ रहे हैं. तीन दिन से मैं वामपंथ के बारे में पढ़ रहा हूं. मुझे पता है कि लेफ्ट का विचार दुनिया का सबसे सार्थक विचार रहा है. इसे कार्ल मार्क्स ने शुरू किया था.
“मैंने कहा, नहीं मुतरेजा, वामपंथ की शुरुआत मार्क्स से नहीं हुई थी. तुम्हारी समस्या यह है कि तुम तीन दिन पढ़कर तीन सौ साल का इतिहास अपने नाम कर लेना चाहते हो.”
वह कुछ झेंपा, फिर बोला, लेकिन गुरुदेव, वामपंथी होने के बाद लोग मुझे बुद्धिजीवी तो समझेंगे न? अब तो मैंने दाढ़ी भी उगा ली है. मैंने कहा, नहीं मुतरेजा, वामपंथी होने के बाद लोग तुम्हें वामपंथी ही समझेंगे. बस तुम खुद को बुद्धिजीवी समझने लगोगे. चश्मा पहनने से नजर ठीक नहीं होती, सिर्फ देखने की सुविधा मिलती है.
तो क्या वामपंथी होना गलत है?
वह बोला, तो क्या वामपंथी होना गलत है?
नहीं. गलत या सही होने का फैसला किसी के झंडे से नहीं, उसके विचार और काम से होता है. विचारधारा को समझना और विचारधारा का तमगा लगाना दो अलग बातें हैं. दवा की दुकान पर बैठने से कोई डॉक्टर नहीं हो जाता. और डॉक्टर की पर्ची जेब में रख लेने से बीमारी भी ठीक नहीं होती.
मुतरेजा ने झट से पूछा, तो वामपंथ की शुरुआत कहां से हुई?
आज जिन शब्दों को हम वामपंथ और दक्षिणपंथ कहते हैं, उनकी राजनीतिक शुरुआत फ्रांसीसी क्रांति के दौर में मानी जाती है. अठारहवीं सदी के आखिर में फ्रांस आर्थिक संकट, भारी सरकारी कर्ज और सामाजिक असमानता से जूझ रहा था. पादरी और कुलीन वर्ग को विशेष अधिकार हासिल थे, जबकि किसानों, मजदूरों, व्यापारियों और आम नागरिकों पर करों का बड़ा बोझ पड़ता था. 1789 में राजा लुई सोलहवें ने आर्थिक संकट से निपटने के लिए एस्टेट्स जनरल की बैठक बुलाई.
वहां प्रतिनिधित्व और मतदान के तरीके पर विवाद हुआ. तीसरे वर्ग ने बराबर राजनीतिक अधिकारों की मांग की और 17 जून को खुद को राष्ट्रीय सभा घोषित कर दिया. 20 जून को टेनिस कोर्ट शपथ में संविधान बने बिना अलग न होने का संकल्प लिया गया. 14 जुलाई को पेरिस की जनता ने बास्तील के किले पर धावा बोला. इसके बाद सामंती विशेषाधिकारों के उन्मूलन और नागरिक अधिकारों की घोषणा जैसे बड़े बदलाव हुए.
भंगिमा मेरे लिए कोई अपरिचित बात नहीं थी
मुतरेजा एकटक मेरा मुंह ताक रहा था. लेकिन यह भंगिमा मेरे लिए कोई अपरिचित बात नहीं थी. उस राष्ट्रीय सभा में राजा और पुरानी व्यवस्था के समर्थक अध्यक्ष की दाईं ओर बैठते थे. राजसत्ता को सीमित करने और बदलाव चाहने वाले लोग बाईं ओर. यहीं से दायां और बायां राजनीतिक पहचान के रूप में चल पड़े. लेकिन उस समय का वामपंथ आज के मार्क्सवाद जैसा नहीं था. मार्क्स का जन्म 1818 में हुआ था. फ्रांसीसी क्रांति के शुरुआती वामपंथी मार्क्सवादी नहीं थे. उनमें ऐसे लोग भी थे जो सामंती विशेषाधिकारों और निरंकुश राजसत्ता के खिलाफ थे, लेकिन निजी संपत्ति और बाजार को पूरी तरह खत्म करने के पक्ष में नहीं थे.
“मार्क्स का तर्क था कि मजदूर अपना श्रम बेचता है”
मुतरेजा ने आंखें फैलाकर पूछा, तो फ्रांसीसी क्रांति मार्क्स के बिना हो गई थी?
जी हां, इतिहास ने मार्क्स के जन्म का इंतजार नहीं किया था. तुम्हारे पैदा होने से पहले भी बैंक कर्ज देते थे और तुम्हारे बाद भी देते रहेंगे. वह खिसियाकर हंसा. फिर मार्क्स ने क्या कहा?
कार्ल मार्क्स जर्मन विचारक थे. फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ उन्होंने 1848 में कम्युनिस्ट घोषणा पत्र लिखा. उनकी चर्चित कृति दास कैपिटल का पहला खंड 1867 में प्रकाशित हुआ. मार्क्स ने इतिहास को वर्ग संघर्ष के नजरिए से देखा. उनके मुताबिक समाज की आर्थिक संरचना, उत्पादन के साधनों पर किसका अधिकार है और श्रम से पैदा होने वाली संपत्ति किसके हाथ में जाती है, इन बातों का राजनीति, कानून और सामाजिक संबंधों पर गहरा असर पड़ता है.
मैंने आगे कहा, मार्क्स का तर्क था कि मजदूर अपना श्रम बेचता है. वह उत्पादन से मूल्य पैदा करता है, लेकिन उत्पादन के साधनों का मालिक होने के कारण पूंजीपति को उससे लाभ मिलता है. मार्क्स ने इसे पूंजी और श्रम के बीच अंतर्विरोध के रूप में देखा. उन्होंने माना कि पूंजीवाद उत्पादन बढ़ाने की क्षमता रखता है, लेकिन साथ ही आर्थिक ताकत और संपत्ति को कुछ हाथों में केंद्रित करने की प्रवृत्ति भी पैदा करता है.
मुतरेजा ने पूछा, तो मार्क्स गलत थे?
बुर्जुआ यानी पूंजीपति और सर्वहारा यानी श्रमिक
इतिहास को इतने छोटे डिब्बे में क्यों बंद करते हो? मार्क्स की पूंजी और श्रम पर की गई पड़ताल आज भी महत्वपूर्ण है, लेकिन उनकी कुछ आर्थिक अवधारणाओं और पूंजीवाद के भविष्य से जुड़े निष्कर्षों पर विद्वानों में मतभेद हैं. दुनिया ने एक ही तरह का पूंजीवाद नहीं देखा. श्रमिक कानून बने, कल्याणकारी राज्य विकसित हुए, सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्थाएं बनीं. इन सुधारों के पीछे मजदूर आंदोलनों, समाजवादी दलों, उदारवादियों और दूसरे राजनीतिक समूहों की अलग-अलग भूमिका रही.
मैंने कहा, मार्क्स ने पूंजीवादी समाज के दो प्रमुख आर्थिक वर्गों पर जोर दिया—बुर्जुआ यानी पूंजीपति और सर्वहारा यानी श्रमिक. लेकिन समय के साथ समाज की आर्थिक संरचना और जटिल हुई. अमीर और गरीब के बीच मध्यवर्ग भी है, जिसके भीतर भी कई स्तर हैं. जिसे हम अपर मिडिल, मिडिल और लोअर मिडिल क्लास कहते हैं. समाज को केवल दो खानों में बांटकर देखना आज की सारी आर्थिक और सामाजिक जटिलताओं को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है.
लेकिन कार्ल मार्क्स के विचार तो पक्के थे ना सर, मुतरेजा इतराकर बोला.
कार्ल मार्क्स ने पूरी जिंदगी ‘पूंजी’ (Das Kapital) नाम की किताब लिखने में बिता दी, पर वह खुद कभी एक पैसा नहीं कमा सके. वह हमेशा अपने अमीर दोस्त फ्रेडरिक एंगेल्स के पैसों पर जीते रहे. इतिहास का सबसे बड़ा कम्यूनिस्ट खुद एक पक्के पूंजीपति की कृपा पर ही जिया.
मुतरेजा मुंह बनाते हुए बोला, सर, अब आप कुछ भी बोल रहे हैं.
वामपंथियों के साथ समस्या बताने पर खिसियाए मुतरेजा
मैंने जवाब दिया, मार्गरेट थ्रेचर को तो तुम नहीं ही जानते होगे. ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थीं, आयरन लेडी कही जाती थीं, उन्होंने एक बार कहा था कि वामपंथियों के साथ समस्या यह है कि अंततः उनके पास दूसरों के पैसे खत्म हो जाते हैं. मुतरेजा थोड़ा खिसिया गया और नीचे देखने लगा और फिर अपनी टी-शर्ट की तरफ देखते हुए बोला.
और चे ग्वेरा?
अर्जेंटीना में पैदा हुआ डॉक्टर. लैटिन अमेरिका की यात्राओं ने उसे गरीबी और असमानता से परिचित कराया. वह फिदेल कास्त्रो के साथ क्यूबा की क्रांति में शामिल हुआ और क्रांति के बाद वहां की सरकार में भी रहा. बाद में दूसरे देशों में क्रांतिकारी आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की. 1967 में बोलीविया में उसे पकड़कर मार दिया गया.
मैंने आगे कहा, उसके जीवन में जोखिम था, संघर्ष था और निजी सुविधा छोड़ने का संकल्प था. उसकी तस्वीर पहनना आसान है, उसके विचारों और तरीकों को समझना कठिन. बाजार ने भी कमाल किया. जिस चेहरे को पूंजीवाद के विरोध का प्रतीक माना गया, उसी की तस्वीर छापकर बाजार ने टी-शर्ट बेचना शुरू कर दिया. विद्रोह भी बिकने लगा. अब क्रांति के लिए किताब पढ़ना जरूरी नहीं, टी-शर्ट काफी है.
भारत में वामपंथ आया कैसे?
मुतरेजा अपनी टी-शर्ट को ऐसे देखने लगा, जैसे पहली बार पता चला हो कि तस्वीर के पीछे भी कोई आदमी था. उसने बात बदल दी.
सर, भारत में वामपंथ आया कैसे?
भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन का विकास भारत के मजदूर आंदोलनों, औपनिवेशिक शासन के विरोध, समाजवादी विचारों और अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन से संपर्क के बीच हुआ. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपनी स्थापना का वर्ष 1925 मानती है. 26 दिसंबर 1925 को कानपुर में हुए सम्मेलन को उसके गठन का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है. हालांकि इससे पहले 1920 में ताशकंद से जुड़े कम्युनिस्ट प्रयास भी हुए थे. यह भी कैसा संयोग है कि धुर विरोधी आर.एस.एस. की स्थापना भी 1925 में ही हुई थी.
मैंने आगे बताया, रूसी क्रांति का दुनिया भर के कम्युनिस्ट आंदोलनों पर प्रभाव पड़ा. बाद में सोवियत संघ और चीन के बीच वैचारिक मतभेद गहरे हुए और उसका असर भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति पर भी पड़ा. 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग होकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) बनी. इसके पीछे सोवियत संघ और चीन के बीच मतभेद, कांग्रेस के प्रति रवैया, संसदीय लोकतंत्र में भागीदारी और क्रांति के रास्ते को लेकर असहमति जैसे कई कारण थे. लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रभाव और किसी विदेशी पार्टी की शाखा होना दो अलग बातें हैं.
वामपंथ का इतिहास केवल क्रांति का नहीं
मुतरेजा ने पूछा, इतने मतभेद थे तो मजदूरों की एकता कैसे बनी?
ठीक से सुनो. वामपंथ का इतिहास केवल क्रांति का इतिहास नहीं, विभाजनों का इतिहास भी है. हर गुट को लगता रहा कि असली क्रांति का रास्ता उसी के पास है. मजदूरों की एकता पर भाषण देने वाले नेता कई बार अपने संगठन की एकता भी नहीं बचा पाए. जब हर गुट के पास क्रांति का अपना नक्शा हो, तो मंजिल से पहले रास्तों पर झगड़ा होना स्वाभाविक है.
वह हंसा, तो आपके मुताबिक वामपंथियों की आपस में भी नहीं बनती.
एकता का सबसे बड़ा दुश्मन कौन
ऐसा नहीं है. मतभेद किसी भी राजनीतिक विचारधारा में होते हैं. लेकिन मतभेद को समझने और हर मतभेद पर अलग झंडा खड़ा कर देने में फर्क है. कभी-कभी लगता है कि मजदूरों की एकता का सबसे बड़ा दुश्मन मजदूर नहीं, एकता की व्याख्या करने वाले नेता बन जाते हैं. मैंने उसे बताया कि शीत युद्ध के दौर में बीस से ज्यादा देशों में कम्युनिस्ट या उनसे जुड़े मार्क्सवादी-लेनिनवादी शासन थे.
सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में आर्थिक ठहराव, राजनीतिक दमन, नौकरशाही, उपभोक्ता वस्तुओं की कमी और राष्ट्रीय आकांक्षाओं जैसे कई सवाल जमा होते गए. 1980 के दशक में गोर्बाचेव ने पेरेस्त्रोइका यानी पुनर्गठन और ग्लासनोस्त यानी खुलापन जैसे सुधार शुरू किए. 1989 में पूर्वी यूरोप के कई कम्युनिस्ट शासन गिर गए और 1991 में सोवियत संघ टूट गया.
यह केवल पूंजीपतियों की साजिश की कहानी नहीं थी. इन व्यवस्थाओं की अपनी आंतरिक कमजोरियां भी थीं. आज चीन, वियतनाम, लाओस, क्यूबा और उत्तर कोरिया को आम तौर पर कम्युनिस्ट-पार्टी शासन वाले देशों में गिना जाता है, लेकिन इनकी आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्थाएं एक जैसी नहीं हैं. चीन और वियतनाम में बाजार और निजी उद्यम की बड़ी भूमिका है, जबकि राजनीतिक सत्ता पर कम्युनिस्ट पार्टी का नियंत्रण बना हुआ है.
मुतरेजा ने पूछा, तो कम्युनिस्ट शासन में सब खराब ही था?
माजवाद और मार्क्सवाद में फर्क क्या है?
इतिहास को काला-सफेद क्यों रंगते हो, मुतरेजा? कुछ कम्युनिस्ट सरकारों ने शिक्षा, औद्योगीकरण, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा में उपलब्धियां हासिल कीं. लेकिन अनेक शासनों में राजनीतिक विरोध दबाया गया, प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित रही और सत्ता एक पार्टी में केंद्रित हो गई. उपलब्धियों से दमन मिट नहीं जाता, और दमन की वजह से हर सामाजिक उपलब्धि झूठी नहीं हो जाती. इतिहास का काम हिसाब रखना है, आरती उतारना नहीं.
कमाल की बात यह भी है मुतरेजा कि दुनिया के बहुत सारे देशों ने कम्युनिस्टों के विचार से जो अच्छी बातें थीं, वो उठा लीं. मसलन, स्वास्थ्य, शिक्षा, न्यूनतम आय, वाजिब मेहनताना, विचारों की आज़ादी, समानता, सबके हित की नीति जैसे सिद्धांतों को पूंजीवादी देशों ने अपनाया और अपने कॉलर सफेद कर लिए. इस तरह जनता भी ख़ुश और सरकारें भी. आज यही पूंजीवादी देश कम्युनिस्ट देशों के मुकाबले अधिक लोकतांत्रिक और जन-पक्षधर नज़र आते हैं.
वह कुछ देर चुप रहा. फिर बोला, सर, समाजवाद और मार्क्सवाद में फर्क क्या है? दोनों एक ही तो हैं?
समाजशास्त्रीय विमर्श में आलोचक अक्सर कहते हैं- “वामपंथ एक ऐसी बीमारी है जो खुद को इलाज बताती है.”
सर आप फिर मुझे भटकाने लगे
भटका नहीं रहा मुतरेजा, बल्कि अब तुम सही सवाल के करीब पहुंचे हो. समाजवाद एक व्यापक विचार-परंपरा है. इसकी कई धाराएं हैं. कुछ समाजवादी उत्पादन के प्रमुख साधनों पर सामाजिक या सार्वजनिक स्वामित्व चाहते हैं. कुछ निजी उद्यम और बाजार को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उन पर सामाजिक नियंत्रण, कल्याणकारी नीतियों और बराबरी के उपायों पर जोर देते हैं.
संविधान में भारत को समाजवादी कहा गया है, मार्क्सवादी नहीं
मैंने कहा, मार्क्सवाद समाजवाद की एक खास और प्रभावशाली धारा है. वह वर्गों, उत्पादन संबंधों और आर्थिक ढांचे के जरिए समाज को समझता है. इसलिए दोनों जुड़े हैं, लेकिन एक ही चीज नहीं हैं.
मुतरेजा ने तुरंत पूछा, लेकिन गुरु जी, संविधान में भी तो लिखा है कि भारत एक समाजवादी राष्ट्र है. तो भारत मार्क्सवादी देश हुआ न? मुझे मुतरेजा की मूर्खता पर गुस्सा आ रहा था. मुतरेजा, संविधान में भारत को समाजवादी कहा गया है, मार्क्सवादी नहीं. दोनों शब्दों को एक समझ लेना वैसा है जैसे घर में दाल और चावल देखकर कहना कि दोनों एक ही चीज हैं. साथ पक सकते हैं, लेकिन स्वाद और काम अलग हैं.
तो संविधान में समाजवाद लिखने का मतलब क्या है?
प्रस्तावना में समाजवादी शब्द 1976 में 42वें संविधान संशोधन से जोड़ा गया. इसका संबंध सामाजिक और आर्थिक न्याय, अवसरों की बराबरी और कल्याणकारी राज्य की दिशा से है. इसका अर्थ यह नहीं कि भारत ने मार्क्सवाद को अपना एकमात्र आधिकारिक सिद्धांत बना लिया या हर नागरिक की संपत्ति बराबर बांट दी जाएगी. भारत में निजी संपत्ति, बाजार, निजी उद्यम, सार्वजनिक क्षेत्र और कल्याणकारी नीतियां साथ-साथ मौजूद हैं.
मुतरेजा कुछ देर सोचता रहा.
तो मैं समाजवादी हूं या मार्क्सवादी?
तुम चुतिया हो. यानी जो अपने कर्तव्यों से च्युत हो. भारत में यह भी बड़ा वर्ग है, चलो अगर नहीं मानते तो यह समझो की अभी तुम लोनवादी हो. पहले यह तय करो कि तुम्हें विचार समझना है या अपने लोन का बदला लेना है.
वह खिड़की से बाहर देखने लगा. शायद पहली बार उसे महसूस हुआ कि विचारधारा का रास्ता झंडे से शुरू होकर सीधे मंजिल तक नहीं जाता. रास्ते में पढ़ना भी पड़ता है, सुनना भी और अपने बारे में कुछ असुविधा जनक बातें स्वीकार करनी पड़ती हैं.
मुतरेजा ने सिर हिलाया. फिर अचानक उत्साह में बोला, सर, वामपंथ बुरा है तो रूस इतना विकसित कैसे है?
माओ के नाम पर वामपंथी वर्षा तक खूनी खेल खेलते रहे
अब तुम सही रास्ते पर हो मुतरेजा. हर वामपंथी इसी तर्क पर चलता है लेकिन 70 के दशक में कुछ कहावतें चला करती थीं. मसलन, जब रूस में बारिश होती है तो भारतीय वामपंथी भारत में छाता खोल लेते हैं. रूस को छींक आती है तो भारतीय वामपंथियों को जुकाम हो जाता है.
मुतरेजा ने बीच में टोककर कहा सर, भारत में वामपंथ गलत है फिर चीन में वही वामपंथ सही कैसे हो जाता है?
मुतरेजा, जिस माओ के नाम पर बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और बिहार-झारखंड में प्रगतिशील वामपंथी वर्षा तक खूनी खेल खेलते रहे, उसी माओ के शासनकाल में चीन में सरकारी नीतियों से उपजे अकाल में दो करोड़ से भी ज्यादा लोग मारे गए. सांस्कृतिक क्रांति के दौरान भी लाखों लोग मौत और उत्पीड़न के शिकार हुए. जिस व्यवस्था का दावा जनता की मुक्ति का था, उसी में जनता की जान की कीमत इतनी सस्ती हो गई कि सत्ता के फैसलों पर सवाल उठाने की गुंजाइश तक नहीं बची. सोवियत रूस में स्तालिन ने सर्वहारा के हित के नाम पर लाखों लोगों को श्रम शिविरों में झोंक दिया, जहां अमानवीय परिस्थितियों में उनसे कठोर श्रम कराया जाता था.
शुद्धिकरण अभियान में सात लाख लोगों को फांसी
1937-38 के शुद्धिकरण अभियान में ही लगभग सात लाख लोगों को फांसी दी गई. इनमें से अनेक के परिजनों को वर्षों तक पता नहीं चला कि उनके अपने कहां गायब हो गए. पूर्वी जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया और हंगरी जैसे पूर्वी यूरोप के देशों में भी कम्युनिस्ट शासन के दौरान यही दमनकारी तौर-तरीके देखने को मिले. पूर्वी जर्मनी में स्टासी की निगरानी ऐसी थी कि नागरिकों की निजी जिंदगी तक सरकारी फाइलों का हिस्सा बन जाती थी.
सत्ता पर कम्युनिस्ट पार्टी का एकाधिकार
इन देशों में चुनाव होते थे, लेकिन अक्सर चुनाव का विकल्प ही नहीं होता था. सत्ता पर कम्युनिस्ट पार्टी का एकाधिकार था. अखबार, पत्रिकाएं, रेडियो, सिनेमा, साहित्य, विज्ञान और कला पर सरकारी नियंत्रण था. पोलित ब्यूरो की मर्जी के खिलाफ बोलने की कीमत चुकानी पड़ती थी. लोहे का परदा इसीलिए खड़ा किया गया था कि बाहर की दुनिया तक भीतर की सच्चाई न पहुंचे और भीतर के लोगों को बाहर की दुनिया की हवा न लगे.
आइजेंस्टाइन और तारकोव्स्की जैसे फिल्मकारों से लेकर सोल्झे नित्सिन और बोरिस पास्तरनाक जैसे लेखकों तक को सत्ता के दबाव और सेंसरशिप का सामना करना पड़ा.
शोस्ताकोविच और रोस्त्रोपोविच जैसे संगीतकार भी राजनीतिक दखल से अछूते नहीं रहे. किसी की रचना को दबाया गया, किसी को अपमानित किया गया, किसी को देश छोड़ना पड़ा. कला और साहित्य से लेकर विज्ञान और खेल तक, कोई क्षेत्र सत्ता की निगरानी से पूरी तरह मुक्त नहीं था. जिस विचारधारा ने इंसान को शोषण से मुक्त करने का दावा किया, उसी के नाम पर इंसान की स्वतंत्रता को सत्ता की जागीर बना दिया गया. और सत्ता के इन स्वयंभू सर्वहारा सेवकों की अपनी जिंदगी देखो. जनता से त्याग की अपेक्षा थी, लेकिन नेताओं के लिए विशेषाधिकारों की कोई कमी नहीं थी. सत्ता के भीतर गुटबाजी चलती थी,
प्रतिद्वंद्वियों को रास्ते से हटाया जाता था और कल तक के साथी को आज सर्वहारा का दुश्मन घोषित कर दिया जाता था. स्तालिन के दौर में केंद्रीय समिति के सदस्यों और सेना के शीर्ष अधिकारियों तक को नहीं बख्शा गया. सत्ता को चुनौती देने का संदेह हुआ नहीं: कि जिन्दगी खत्म.
दुनिया को वर्गों में बांटकर हर समस्या का समाधान खोजते
“यही तो विडंबना है, मुतरेजा. जो लोग दुनिया को वर्गों में बांटकर हर समस्या का समाधान वर्ग-संघर्ष में खोजते हैं, वे सत्ता में पहुंचकर खुद एक नया विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग बना लेते हैं. मजदूर वहीं रहता है, नेता महल में पहुंच जाता है. जनता को समानता का पाठ पढ़ाया जाता है और शासक वर्ग अपने लिए अलग नियम बना लेता है.
इसलिए, मुतरेजा, जब ऐसी ऐतिहासिक विरासत के वारिस मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जनहित की बात करते हैं, तो उनसे हिसाब मांगना जरूरी है. सवाल यह नहीं कि वामपंथियों को इन शब्दों का इस्तेमाल करने का अधिकार है या नहीं. सवाल यह है कि क्या वे इन्हीं अधिकारों को उन लोगों के लिए भी स्वीकार करते हैं, जो उनसे असहमत हैं? क्या वे माओ और स्तालिन के अपराधों की आलोचना उतनी ही साफगोई से कर सकते हैं, जितनी साफगोई से अपने विरोधियों की आलोचना करते हैं?
भारतीय वामपंथियों की अपनी कोई सोच नहीं रही?
परिवर्तन प्रकृति का नियम है, मुतरेजा. कोई विचारधारा इतिहास से ऊपर नहीं होती. जो विचारधारा अपने अतीत के सवालों का सामना करने के बजाय हर सवाल पूछने वाले को दुश्मन समझने लगे, उसका भविष्य भी सवालों के घेरे में आ जाता है. वामपंथ की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह दुनिया को बदलने निकला था, लेकिन कई जगह सत्ता में पहुंचकर खुद को बदलना भूल गया.
मुतरेजा ने पूछा, तो क्या? भारतीय वामपंथियों की अपनी कोई सोच नहीं रही?
मैने कहा बिल्कुल रही- दिल में मॉस्को, दिमाग में बीजिंग और जेब में जेएनयू. वैसे यह एक राजनीतिक तंज है. लेकिन किसी विश्वविद्यालय में पढ़ना अपराध नहीं और किसी विदेशी विचारक को पढ़ना गुनाह नहीं. दिक्कत तब है जब आदमी अपनी जमीन पर खड़े होकर दुनिया को समझने के बजाय दुनिया के किसी दूसरे कोने का चश्मा लगाकर अपनी ही जमीन को देखना भूल जाए. विश्वविद्यालय में पढ़ने से बुद्धि बढ़ सकती है, लेकिन केवल विश्वविद्यालय का नाम लेने से कोई विद्वान नहीं हो जाता.
मुतरेजा का लोन एप्रूव हो गया, फिर क्रांति का क्या होगा?
मुतरेजा कुछ देर सोचता रहा. फिर बोला, सर, आप तो मेरा मन पढ़ लेते हैं.
तभी अचानक उसका फोन बज उठा. उसने स्क्रीन देखी और झल्लाते हुए फोन उठा लिया.
उधर से आवाज आई, सर, मैं फलां बैंक से बोल रही हूं. आपका लोन एप्रूव हो गया है.
मुतरेजा एक ही नजर में मुझे और फोन को देख रहा था. उसके चेहरे पर मुस्कान और गंभीरता के बीच की वह मुद्रा आ गई, जिसमें आदमी तय नहीं कर पाता कि खुश हो या अपनी पुरानी बातों पर शर्मिंदा. फोन रखते ही बोला, सर, कुछ जरूरी काम आ गया है. मैं बाद में आता हूं.
मैंने पूछा, सब ठीक तो है न?हां सर, बैंक जाना है. दूसरे बैंक ने लोन अप्रूव कर दिया.
मैंने मजे लेते हुए पूछा, फिर क्रांति का क्या होगा?
वामपंथ का चौथा लक्षण है यही है- सुविधा
मुतरेजा दरवाजा खोलकर उतरने लगा. जाते-जाते बोला, सर, क्रांति फिर कभी!
वह तेजी से बैंक की तरफ बढ़ गया. जिस आदमी ने कुछ देर पहले पूरी व्यवस्था उखाड़ फेंकने की कसम खाई थी, वह एक फोन कॉल पर व्यवस्था से समझौता करने जा रहा था. क्रांति का तापमान अचानक सामान्य हो गया था. शायद पूंजीवाद इतना भी बुरा नहीं था, बशर्ते वह समय पर कर्ज दे दे. मैंने मन ही मन सोचा- वामपंथ का चौथा लक्षण है यही है- सुविधा. जब तक बैंक लोन नहीं देता, व्यवस्था शोषक है. लोन मंजूर होते ही व्यवस्था में संभावनाएं दिखाई देने लगती हैं. मुतरेजा अब फिर से पूंजीवाद का दरवाजा खटखटाने जा रहा था. अपनी सुविधानुसार वो अगली क्रांति तक राय साहब को फिर से बॉस मान लेगा.
मैंने गाड़ी का दरवाजा बंद किया. तभी नजर पड़ी कि मुतरेजा अपना डंडा वहीं छोड़ गया है. अब यही डंडा मेरा आज का हासिल है.
जय जय.
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