
कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी इन दिनों अपनी आने वाली किताब ‘बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव’ (Belonging: A Journey of Love) को लेकर सुर्खियों में हैं. इस किताब में उन्होंने अपनी जिंदगी के बारे में बताया है. पूर्व पीएम राजीव गांधी से मुलाकात, फिर शादी और फिर उनकी हत्या के साथ ही राजनीति के सफर के बारे में लिखा है. अपनी किताब के लॉन्च से पहले सोनिया गांधी ने एक इंटरव्यू के दौरान कई निजी और राजनीतिक सवालों के जवाब दिए.
इस इंटरव्यू में कई विषयों पर चर्चा की गई है, जैसे उन्होंने बिलॉन्गिंग (अपनापन) के बारे में अपनी कहानी कैसे लिखी, वे किन मूल्यों के साथ बड़ी हुईं और भारत में उन्होंने किन मूल्यों को सीखा और अपनाया, उन्होंने राजीव गांधी और इंदिरा गांधी से क्या सीखा और कैसे उन्होंने उनके जीवन और दृष्टिकोण को आकार दिया, बीजेपी-आरएसएस शासन ने हमारे देश के ताने-बाने, हमारे लोकतंत्र और हमारी संस्थाओं को कितना बड़ा नुकसान पहुंचाया है, 1975-1977 के आपातकाल (इमरजेंसी) को उन्होंने उस समय कैसे देखा था और आज वो उसे कैसे देखती हैं. 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष का पद स्वीकार करने, 1999 में कुछ साथियों की चुनौती के बावजूद इस पद पर बने रहने, और 2004 में प्रधानमंत्री बनने के प्रस्ताव को ठुकराने जैसे उनके बड़े राजनीतिक फैसले; मौजूदा राजनीतिक हालात और कांग्रेस एवं उसके गठबंधन सहयोगियों की संभावनाएं और किताब के लॉन्च से कुछ हफ्ते पहले भारत में प्रकाशक (पब्लिशर) का बदलना.
‘अपने बारे में लिखी किताबें पढ़ने का मन नहीं किया’
हाल ही में सोनिया गांधी ने सोशल मीडिया पर लिखा था दूसरों ने दशकों तक मेरी कहानी बताई है, अब मेरी बारी है’. कम से कम 75 ऐसी किताबें हैं, जजो सोनिया गांधी की कहानी बताने का दावा करती हैं या बताने की कोशिश करती हैं.जब गांधी से पूछा गया कि क्या उन्होंने उन किताबों को पढ़ा है, जिनमें दशकों तक आपकी कहानी बताई है?. इसके जबाव में उन्होंने कहा ‘मुझे अंदाजा भी नहीं था कि इतनी सारी किताबें हैं! लेकिन मेरा कभी अपने बारे में लिखी गई किताबें पढ़ने का मन नहीं किया’.
उन्होंने कहा ‘काफी समय पहले राजीव और मुझे यह समझ आ गया था कि हमारे बारे में जो कुछ भी लिखा गया है, उस सबके साथ कदम मिलाकर चलने की कोशिश करने का कोई मतलब नहीं है. लेकिन, जैसा कि मैंने किताब में बताया है, एक समय ऐसा आया जब मुझे लगा कि मुझे अपनी कहानी खुद बतानी चाहिए’.
किताब में प्यार और सियासत का सफर
सोनिया गांधी किताब के केंद्र में एक प्रेम कहानी है. यह राजीव और सोनिया के बीच एक असाधारण, तुरंत बन जाने वाले और गहरे प्रेम-बंधन की कहानी है. यह बंधन धीरे-धीरे इतना बड़ा हो गया कि सोनियां गांधी सत्ता को सत्ता के सर्वोच्च गलियारों में ले आया, फिर अनिच्छा के बावजूद सार्वजनिक जीवन और राजनीति में खींच लाया, और अंततः उन्हें देश के प्रमुख राजनीतिक नेताओं में से एक बना दिया. यह कल्पना से भी ज़्यादा अद्भुत है. इस पर उन्होंने कहा हां. उन्होंने बताया ‘यही एक कारण है कि इतने लंबे समय तक मेरी इस बारे में बात करने की कोई इच्छा नहीं थी. लेकिन यह सिर्फ हम दोनों के बीच की प्रेम कहानी नहीं है; यह इस बात की भी कहानी है कि कैसे मुझे राजीव के परिवार और उस देश से प्यार हो गया जिससे वे जुड़े थे, और फिर मैं भी उसी का एक हिस्सा बन गई. और यह भी कि कैसे इस प्यार ने मुझे सार्वजनिक जीवन में ला खड़ा किया. जब मैंने देखा कि उनके द्वारा दिए गए सभी बलिदानों का उद्देश्य खतरे में पड़ गया है और पार्टी कमज़ोर हो रही है. मुझे लगा कि मुझे कुछ करना ही होगा’.
‘मैं आज भी वही हूं, जिससे राजीव 60 साल पहले मिले थे’
इटली के एक छोटे से शहर में पली-बढ़ीं सेनिया गांधी एक ऐसे पारिवारिक और सामाजिक माहौल में, जो उस दुनिया से बिल्कुल अलग था जिसमें वो आगे चलकर रहीं और जिसे आपने अपना बना लिया. भारत में बिताए छह दशकों से ज़्यादा के समय को पीछे मुड़कर देखें, तो आज वो जो हैं, उसमें उस युवा इतालवी महिला का कितना अंश अब भी मौजूद है?. इसके जवाब में उन्होंने कहा ‘बचपन और जवानी के दिनों में मैंने जो मूल्य सीखे, वो आज भी मेरे साथ हैं. मैंने हमेशा उन मूल्यों पर खरा उतरने की पूरी कोशिश की है. परिवार और दोस्तों के प्रति वफादारी, ईमानदारी, दूसरों के लिए संवेदना, और अपने कर्तव्यों व जिम्मेदारियों को निभाने की भावना. मैं कह सकती हूं कि इन मामलों में मैं आज भी वही इंसान हूं, जिससे राजीव साठ साल पहले मिले थे. हालांकि, उन दिनों मैं कहीं ज़्यादा मुस्कुराती और हंसती थी!’.
जिंदगी में राजीव गांधी और इंदिरा गांधी का असर
सोनिया गांधी की कहानी में राजीव गांधी से प्यार और इंदिरा गांधी जिनके साथ उनका बेहद करीबी रिश्ता था सबसे अहम किरदार हैं. पीछे मुड़कर देखने पर, उनकी कौन सी खास खूबियं नज़र आती हैं? और उन्होंने किस तरह सोनिया के जीवन और नज़रिए को आकार दिया?. उन्होंने बताया ‘जब मैं एक नई बहू के रूप में भारत आई, तो मुझे यहां के बारे में कुछ भी नहीं पता था. आज मैं जो कुछ भी हूं और जो कुछ भी जानती हूं, वह सब मैंने उन्हीं से सीखा है. उनका साहस, दूसरों के प्रति उनकी संवेदना, एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत के प्रति उनकी प्रतिबद्धता, और सबसे बढ़कर, कर्तव्य के प्रति उनका गहरा समर्पण जो उनके लिए किसी भी अन्य चीज़ से बढ़कर था, इन सबने मुझे प्रेरित किया, मुश्किल और दुविधा भरे समय में, इन्हीं मूल्यों ने मुझे अडिग बनाए रखा’.
आपातकाल पर क्या बोलीं सोनिया गांधी
आपातकाल (इमरजेंसी) के बारे में पूछे गए सवाल पर सोनिया गांधी ने कहा ‘आम लोगों की नज़र में संजय गांधी को अक्सर आपातकाल का पर्याय माना जाता है, लेकिन बात सिर्फ उनकी नहीं थी. इंदिरा गांधी पर उनके कुछ वरिष्ठ सहयोगियों का भी काफी दबाव था. मुझे लगता है कि उनके आस-पास राजीव जैसे बहुत कम लोग थे, जिनकी अपनी अलग राय होती थी. मुझे लगता है कि आखिरकार मेरी सास ने अपनी सूझबूझ से स्थिति को समझना शुरू किया और हालात सुधारने के लिए कदम उठाए’.
उन्होंने कहा ‘आपातकाल के बाद ही मुझे पता चला कि उस समय जो कुछ हो रहा था, वह कितना गंभीर था. हां, लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया था और ‘हेबियस कॉर्पस’ (बंदी प्रत्यक्षीकरण) को निलंबित कर दिया गया था, लेकिन यह सब संवैधानिक तरीके से किया गया था. फिर भी, जब मैं उस दौर को याद करता हूं और इंदिरा गांधी के नजरिए से देखने की कोशिश करता हूं, तो मुझे वे तेजी से बिगड़ते हालात से जूझती हुई दिखाई देती हैं. हिंसक विरोध-प्रदर्शन, सरकारी दफ्तरों और सार्वजनिक परिवहन में आगजनी, बड़े पैमाने पर सुनियोजित अशांति, और यहां तक कि नौकरशाही और सशस्त्र बलों से आदेश न मानने का आह्वान. पीछे मुड़कर देखने पर हम चीजों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इंदिरा गांधी ने ही खुद समझा कि क्या हो रहा है और मार्च 1977 में चुनाव कराने का फैसला लिया. और आप अच्छी तरह जानते हैं कि बाद में उन्होंने खुद सार्वजनिक रूप से खेद जताया और आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों के लिए माफी भी मांगी’.
RSS और BJP का भी किया जिक्र
सोनिया ने अपनी किताब में RSS, BJP का भी जिक्र किया है. उन्होंने बताया गया है कि ये भारत के समाज और राजनीति के लिए, खासकर लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और बंधुत्व जैसे संवैधानिक मूल्यों के लिए कितने खतरनाक हैं. जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें लगता है कि कांग्रेस पार्टी ने ऐतिहासिक रूप से और हाल के समय में भी इन बुनियादी मुद्दों पर खुद को RSS के नेतृत्व वाली हिंदुत्ववादी ताकतों से स्पष्ट, लगातार और प्रभावी ढंग से अलग रखा है?. गांधी ने जवाब में कहा ‘बिल्कुल! मैं मानता हूं कि पार्टी के भीतर कुछ लोग ऐसे थे जिनका मानना था कि धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर हमें इतना सख्त (यानी ‘ब्लैक एंड व्हाइट’) रुख नहीं अपनाना चाहिए. लेकिन यह पार्टी का आधिकारिक नजरिया नहीं है. मेरा मानना है कि अपनी नीतियों और कार्यों के माध्यम से, हम अपने लोगों के उस संवैधानिक अधिकार के समर्थन में दृढ़ता से खड़े रहे हैं, जिसके तहत वे बिना किसी डर के पूजा-पाठ कर सकते हैं और अपने धर्म व आस्था का पालन कर सकते हैं’.
‘मुझे नहीं लगता कि RSS से कुछ सीखने की जरूरत है’
गांधी से पूछा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में आप लिखती हैं कि आप और वे अलग-अलग वैचारिक दुनिया से आते हैं और भारत को लेकर आप दोनों के विचार बहुत अलग हैं. उन्होंने कहा कि यह सच है कि वे एक बिल्कुल अलग वैचारिक दुनिया से आते हैं. लेकिन राजनीति में सफल होने के कई तरीके होते हैं कांग्रेस पार्टी के भीतर ही, उदाहरण के लिए डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को देख लीजिए. मुझे नहीं लगता कि हमें RSS से कुछ सीखने की जरूरत है.
विदेशी मूल के मुद्दे पर छलका दर्द
कांग्रेस नेताओं शरद पवार, पी.ए. संगमा और तारिक अनवर द्वारा आपके विदेशी मूल का मुद्दा उठाने और यह कहने पर कि आप भारत में किसी उच्च पद पर नहीं रह सकतीं, इसके जवाब में उन्होंने कहा मेरी आंखों में आंसू आ गए और मैं बैठक से बाहर आ गई. मैं कोई पद या सत्ता पाने के लिए राजनीति में नहीं आई थी. इन्हीं में से कुछ साथियों ने मुझे राजनीति में आने के लिए कहा था, और अब वे ही मेरे खिलाफ हो गए थे. मुझे इस बात से दुख नहीं हुआ कि मुझे कोई पद नहीं मिला, दुख इस बात का था कि भारत के प्रति मेरी निष्ठा पर सवाल उठाए जा रहे थे’.
‘उनका मुझ पर भरोसा नहीं था…’
कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने और पार्टी नेताओं के कहने पर अध्यक्ष पद पर बने रहने रहीं. क्या इस घटना ने आपके इस संकल्प को और मजबूत कर दिया कि अगर कभी मौका मिले भी, तो भी आप प्रधानमंत्री का पद स्वीकार नहीं करेंगी?. उन्होंने कहा ‘बेशक, मुझे दुख हुआ. ये मेरे सहयोगी थे और मुझ पर उनका भरोसा था, लेकिन बाद में पता चला कि उनका मुझ पर भरोसा नहीं था. यह जानकर गहरा धक्का लगा कि वे मुझे अभी भी एक बाहरी व्यक्ति मानते थे. पीछे मुड़कर देखती हूं, तो समझ आता है कि शायद उनके अपने कारण रहे होंगे. लेकिन यह मेरे राजनीतिक जीवन की शुरुआत थी, और प्रधानमंत्री बनने का खयाल तो मेरे दिमाग में दूर-दूर तक नहीं था. हां, मैंने इस्तीफा तो दे दिया था, लेकिन फिर आत्म-मंथन करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं अपनी निजी भावनाओं को अपने बड़े मकसद के आड़े नहीं आने दे सकती. मुझे आगे बढ़ते रहना था’.
प्रधानमंत्री न बनने के फैसले का जिक्र
किताब में एक अध्याय, राजनीतिक दृष्टि से शायद सबसे दिलचस्प है, और व्यक्तिगत रूप से सबसे भावुक कर देने वाला भी. यह 2004 में कांग्रेस की जीत के बाद सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री न बनने के फैसले पर नई रोशनी डालता है. उस समय लगभग हर किसी को यही उम्मीद थी कि वो यह पद संभालेंगी. आम चुनाव से कई महीने पहले, जब उनसे पूछा गया था कि क्या कांग्रेस के जीतने पर आप यह पद स्वीकार करेंगी, तो उन्होंने अपने एक बच्चे से साफ कह दिया था, ‘बिल्कुल नहीं’. उन्होंने बताया कि राहुल और प्रियंका इसके सख्त खिलाफ थे. अपनी दादी और पिता की हत्या के खौफ के कारण उन्हें यकीन था कि इस पद के साथ बहुत बड़ा खतरा जुड़ा है. उन्होंने बताया कि फिर भी, जब पार्टी नेताओं ने उन पर पद स्वीकार करने का भारी दबाव डाला तो उन्होंने ‘ठीक है’ कहकर हामी भर दी, लेकिन बाद में अपना इरादा बदल लिया. आखिरकार, डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने.
सोनिया गांधी से पूछा गया कि क्या उन्होंने कभी सोचा है कि अगर उन्होंने वह पद स्वीकार कर लिया होता, तो UPA की नीतियां और कांग्रेस की रणनीति किस तरह अलग होतीं? क्योंकि उन्हें उस समय भी और आज भीडॉ. सिंह और कांग्रेस के ज्यादातर नेताओं की तुलना में एक ‘सोशल डेमोक्रेट’ (सामाजिक लोकतंत्रवादी) के रूप में अधिक देखा जाता है. उन्होंने जवाब दिया ‘नहीं, बिल्कुल नहीं. ऐसा खयाल मेरे दिमाग में कभी नहीं आया. हमारा अनुभव कुल मिलाकर बहुत सकारात्मक रहा. हमने एक टीम के रूप में काम किया, और हमारी भूमिकाएं बिल्कुल स्पष्ट थीं.वे सरकार का नेतृत्व कर रहे थे और मैं पार्टी का’.
‘राजनीतिक समझौते करने पड़े…’
कांग्रेस नेता से पूछा गया कि किताब में उन्होंने कहा कि राजनीतिक समझौते करने पड़े, तब वो काफी दुविधा में थीं,उन्होंने कहा ‘
व्यावहारिक होकर सोचें तो राजनीति में कभी-कभी समझौते करना जरूरी हो जाता है. कई बार हमारे सामने ऐसे कठिन राजनीतिक विकल्प आए, जहां हमें उन लोगों के साथ हाथ मिलाना पड़ा जिनकी राजनीतिक विचारधारा हमसे बिल्कुल अलग थी. यह बात मुझे कभी रास नहीं आई. लेकिन एक बात को लेकर मैं पूरी तरह स्पष्ट हूं, हमने कभी भी BJP और RSS के साथ कोई समझौता नहीं किया और न ही कभी करेंगे’.
2029 के लोकसभा चुनाव को लेकर क्या कहा
उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें लगता है कि अगर 2029 के लोकसभा चुनाव में BJP सत्ता से बाहर हो जाती है, तो हालात बदलेंगे और राजनीति फिर से नीतियों और कार्यक्रमों पर आधारित हो जाएगी? . उन्होंने कहा ‘पिछले बारह वर्षों में हमारे देश के ढांचे, हमारे लोकतंत्र और हमारी संस्थाओं को भारी नुकसान पहुंचा है. इस सरकार के जाने के बाद भी, हमारी व्यवस्थाओं को फिर से पटरी पर लाने में समय लगेगा और इसके लिए राजनीतिक दलों को बहुत मेहनत करनी होगी. लोग अब बेचैन होने लगे हैं और उन्हें इस नुकसान का एहसास हो रहा है. लेकिन मैं आशावादी हूं और मुझे यकीन है कि भारत की जनता एक बेहतर और सही शासन व्यवस्था की वापसी का स्वागत करेगी’.
‘हमारी पार्टी डटकर लड़ रही है और आगे बढ़ रही है’
भारत की प्रमुख पार्टी के रूप में कांग्रेस का पतन एक राजनीतिक सच्चाई है. पिछले तीन दशकों में, कांग्रेस हिंदुत्ववादी ताकतों के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए संघर्ष करती रही है. 2004 से 2014 के बीच पार्टी की स्थिति में कुछ सुधार जरूर हुआ था, लेकिन आलोचकों का कहना है कि पार्टी इस गिरावट के सिलसिले को पलट नहीं पाई है. इस मौजूदा स्थिति और भविष्य की संभावनाओं को वो कैसे देखती हैं?. इस पर उन्होंने कहा ‘ मैं इतनी निराशावादी नहीं हूं. इस बात पर गौर करें कि जब से यह सरकार सत्ता में आई है, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को कभी भी समान अवसर (level playing field) नहीं मिला है. आप देखिए कि सभी संस्थाओं – खासकर चुनाव आयोग पर उनका पूरा कब्ज़ा है, मुख्यधारा की मीडिया पर उनका नियंत्रण है, उनके पास बेहिसाब पैसा है और वे धर्म का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रहे हैं. इसके बावजूद, हमारी पार्टी डटकर लड़ रही है और आगे बढ़ रही है.
उन्होंने कहा ‘असल में, यह इकलौती ऐसी पार्टी है जिसमें इस हमले को झेलने की हिम्मत है. हमारे कार्यकर्ताओं और नेताओं ने बहुत साहस दिखाया है. उन्होंने हर तरह के उत्पीड़न का सामना किया है, फिर भी हर गांव और हर जिले में कांग्रेस के लोग हमारे संविधान में निहित मूल्यों के लिए लड़ रहे हैं. इतना ही नहीं, हाल के महीनों में यह बात भी काफी हद तक साबित हो गई है कि कई चुनाव ‘चुराए’ (धांधली से जीते) गए हैं, और अब लोग इस बारे में पहले से कहीं अधिक जागरूक हैं. कांग्रेस समान विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर काम कर रही है, और हमारी संभावनाएं दिन-ब-दिन बेहतर होती जा रही हैं’.
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