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उदंत मार्तंड और हिंदी पत्रकारिता के 200 बरस

May 30, 2026 by Uma Shankar

यह हिन्दी पत्रकारिता के आत्ममंथन का दौर है. दो सौ बरस में हम कहां से कहां पहुंच गए. यह सिर्फ हिंदी पत्रकारिता के दो सौ बरस का इतिहास नहीं है. यह आजादी की लड़ाई का इतिहास भी है. हिन्दी भाषा का इतिहास भी है. हिंदी समाज के स्वाभिमान का इतिहास भी है. हिन्दी अब हीनता बोध में नहीं है वह अपनी वैश्विक उपस्थिति दर्ज करा रही है. दो सौ बरस पहले जब भारत में हिंदी पत्रकारिता जन्म ले रही थी. उस वक्त समाज और देश कारा में थे. पूरी दुनिया बहुत तेजी से बदल रही थी.

इसके सापेक्ष भारत गुलामी की नई नस्ल के चंगुल में अपने वजूद को पहचानने, बदलने और बनाने की क़वायद कर रहा था. दो शताब्दी पहले हिंदी खड़ी बोली, हिंदी गद्य और हिंदी पत्रकारिता, तीनों ने एक साथ चलना शुरू किया था. ऐसे में हिन्दी के पहले अख़बार उदन्त मार्तण्ड का छपना एक युगान्तकारी घटना थी. तब का समाज भी साक्षरता का अल्पमत समाज था. भाषा अभी कच्ची थी और देश तथा समाज ग़ुलाम थे. भाषा बन रही थी और पत्रकारिता ख़ुद नए प्रयोगों के आधार पर सीख और संवर रही थी.

आप कल्पना कीजिए पत्रकारिता की शुरुआत के समय की. पढ़े-लिखे लोग न के बराबर हैं. जो साक्षर हैं, उनके पास न तो अभी भाषा के रूप में खड़ी बोली का कोई व्यवस्थित स्वरूप है और न ही पत्रकारिता का कोई अनुभव. हो भी कैसे, छपाई भी नहीं है. छापेखाने भी तो उसी समाज में होंगे न, जहां साक्षरता और तकनीक दोनों पुख्ता हो चुके हों. जब साक्षर ही नहीं तो पढ़ने के लिए तैयार बैठी आबादी भी नहीं और आबादी को पढ़ाया-सिखाया तब जा सकता है जब छपाई की व्यवस्था हो इसलिए यह दौर भारतीय समाज के परिवर्तन का जटिल प्रसव है, पर यह पूरा घटाटोप भाषा, साक्षरता और पत्रकारिता के लिए भादों की अष्टमी बन गया. ये एक बड़े परिवर्तन का समय भी बना और साक्षी भी.

उदन्त मार्तण्ड ने जन्म से ही आज़ादी की शुरुआती लड़ाई लड़ी. पं. युगल किशोर सुकुल और उनके साथियों ने उस समय यह अखबार निकाला, जब सफलता की कोई गारंटी नहीं थी. संसाधन सीमित थे. पाठक कम थे. पत्रकारिता का भी कोई अनुभव नहीं था. सत्ता की कृपा नहीं थी. फिर भी उन्होंने शुरुआत की क्योंकि कुछ काम सफलता के लिए नहीं, आवश्यकता के लिए किए जाते हैं. कुछ दीपक इसलिए नहीं जलते कि वे अंधेरे को समाप्त कर देंगे; वे इसलिए जलते हैं कि अंधेरे के सामने आत्मसमर्पण नहीं करेंगे.

उदन्त मार्तण्ड से मिली सीख

इतिहास की बड़ी घटनाएं बहुत शोर शराबे के साथ नहीं आतीं. वे चुपचाप जन्म लेती हैं. जैसे मिट्टी के भीतर कोई बीज जन्म लेता है. बाहर से देखने पर कुछ दिखाई नहीं देता, लेकिन भीतर एक भविष्य आकार ले रहा होता है. उदन्त मार्तण्ड भी आज़ादी का ऐसा ही एक बीज था. वह केवल हिंदी का पहला समाचार पत्र नहीं था; वह उस भारतीय आत्मा की पहली मुद्रित आहट थी जो अपनी भाषा में स्वयं को पहचानना चाहती थी. यह उस वक्त का बड़ा सवाल था क्या कोई समाज अपनी भाषा के बिना सचमुच जाग सकता है? क्या कोई राष्ट्र उधार की चेतना से अपना भविष्य रच सकता है? उदन्त मार्तण्ड का जबाब था- नहीं.

उदन्त मार्तण्ड ने अंग्रेज़ सत्ता से सवाल भी किए. अंग्रेज़ व्यापारियों की आलोचना भी की. अंधविश्वास के विरुद्ध वैज्ञानिक सोच का समर्थन किया. यह देखकर आश्चर्य होता है कि हिंदी पत्रकारिता की पहली सांस में ही विवेक, प्रतिरोध और आधुनिक चेतना की गंध मौजूद थी, पर उदन्त मार्तण्ड दो बरस में ही बंद हो गया. उसके संपादक की आशाएं अधूरी रह गईं पर वे निराश नहीं थे. उनके सपनों का पूरा विस्तार शायद उनकी आंखें नहीं देख सकीं क्योंकि इतिहास में कुछ लोग फसल काटने के लिए नहीं, केवल बीज बोने के लिए आते हैं. उनका श्रम उनके जीवनकाल से बड़ा होता है. उनका प्रतिफल उनकी पीढ़ी को नहीं, आने वाली पीढ़ियों को मिलता है. आज जब हम हिंदी पत्रकारिता के विशाल संसार को देखते हैं, तो उसके मूल में कहीं न कहीं वही छोटा-सा बीज दिखाई देता है. वही जिद. वही विश्वास. वही साहस.

उदन्त मार्तण्ड हमें सिखाता है कि जो प्रयास अपने समय में असफल दिखते हैं, वे कभी-कभी इतिहास की सबसे बड़ी सफलताओं की नींव बन जाते हैं. नींव के पत्थर दिखते नहीं हैं. नींव मिट्टी में दबा दी जाती है. लेकिन नींव एक ढांचे का आधार बना देती है. इसके ऊपर नीड़ बनता है. इमारत बनती है. नींव का अंधेरे में डूबना उजाले की शुरुआत बन जाता है. दो वर्ष तक चला वह पत्र दो शताब्दियों बाद भी याद किया जा रहा है और यही उसकी सबसे बड़ी विजय है. इसलिए उदन्त मार्तण्ड को याद करना अतीत को याद करना भर नहीं है. यह उस विश्वास को प्रणाम करना है कि शब्द संसार बदल सकते हैं कि भाषा केवल अभिव्यक्ति नहीं, आत्मसम्मान भी है, कि कोई भी प्रयास, यदि वह लोकहित और सत्य की भूमि पर खड़ा है, कभी पूरी तरह निष्फल नहीं जाता.

दो सौ साल बाद भी उदन्त मार्तण्ड हमें यही सिखाता है. इसी मार्तण्ड के उदय से जो सिलसिला शुरू हुआ, वो हिंदी पत्रकारिता के जन्म और वंश विस्तार का बीज बना. बोलियों और क्षेत्रीय भाषाओं के आंगन से हिंदी खड़ी बोली बनकर दहलीज़ से बाहर आ रही थी. गद्य बन रहा था. साहित्य लिखा जा रहा था. इसी क्रम में पत्रकारिता भी शुरू हो रही थी.

हालांकि, 1976 से पहले हिन्दी का पहला अखबार बनारस अखबार माना जाता था. साहित्यकार और पत्रकार ठाकुर प्रसाद सिंह ने लखनऊ में मई 1976 में एक बड़ा जलसा किया. जिसमें उदन्त मार्तण्ड को हिन्दी का पहला अखबार घोषित कर हर साल इसी रोज़ हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाने का ऐलान किया गया. इस समारोह की सदारत मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने की थी. इससे पहले तक बनारस अख़बार को ही हिंदी पत्रकारिता का बीज अखबार समझा जाता था. ‘बनारस अखबार’ जनवरी 1845 में काशी (वाराणसी) से प्रकाशित हुआ. यह हिंदी का पहला समाचार-पत्र माना जाता था. इसके संपादक गोविंद रघुनाथ थत्ते थे. इस समाचार पत्र को निकालने में राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ का प्रमुख योगदान था.

‘बनारस हिंदी पत्रकारिता का दूसरा आंगन’

बंगाल और बनारस का इस मामले में कनेक्शन विचित्र है. बैरकपुर में एक चिंगारी फूटी और बलिया का वीर क्रांतिकारी विद्रोह का चेहरा बन गया. वहीं कलकत्ते में कानपुर के वकील जुगल किशोर शुक्ल ने उदन्त मार्तण्ड की नींव रखी. कानपुर की पत्रकारिता का शुक्ल पक्ष भी रोचक है. जुगल किशोर सुकुल से शुरू होकर, शंभू नाथ सुकुल से होता हुआ राजीव सुकुल तक पहुंचता है. यह तो आनन्द का संयोग है. हालांकि उसको विस्तार बनारस ने दिया. बनारस हिंदी पत्रकारिता के बालकांड का साक्षी भी था और सूत्रधार भी. कलकत्ते के बाद बनारस हिंदी पत्रकारिता का दूसरा आंगन था. हिंदी साहित्य की पहली पत्रिका कविवचन सुधा 1867 में, 1873 में हरिश्चन्द्र मैगजीन और 1874 में हरिश्चन्द्र चन्द्रिका छाप भारतेंदु बाबू ने पत्रकारिता की शुरुआत की. यहां बनारस में ही हिंदी पत्रकारिता को गठन मिला, भाषा मिली, शब्द और शैली मिले.

पत्रकारिता सामयिक बोध का लेखन है. सूचना का काम है इसलिए इसमें भाव का लावण्य नहीं, समय की छुरी होती है. जो घट रहा है, उसकी सूचना और फिर उसी सूचना का प्रभाव, अभाव, सद्भाव सब पत्रकारिता की विषयवस्तु बनते है. गुलामी में जन्म लेने वाली पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती और प्रेरणा भी गुलामी ही बनी. चुनौती इसलिए, क्योंकि एक पूरा समाज अपनी गुलामी से लड़ने के लिए भाषा और माध्यम खोज रहा था. प्रेरणा इसलिए, क्योंकि पहचान की भूख और बदलाव की बेचैनी एक दबाए जा रहे समाज में ज्यादा होती है.

फिर ये गुलामी केवल अंग्रेजों की गुलामी तो थी नहीं. भारत का पूरा समाज पीढ़ी-दर-पीढ़ी और सदी-दर-सदी इतनी वेदनाओं, आघातों से गुजरा था कि उसके आंचल में कुंठाएं, कुरीतियां, वर्जनाएं, हीनता और अशिक्षा की गहरी खाइयां थीं. आप भारतेंदु का लेखन देखें. अंधेर नगरी, चौपट राजा जैसे नाटक ही नहीं, भारत दुर्दशा जैसे निबंध और लेख समाज और देश की बराबर चिंता व्यक्त करते मिलेंगे इसलिए हिंदी की पत्रकारिता केवल अंग्रेज़ी गुलामी से नहीं, मानसिक गुलामी से भी लड़ने के लिए मैदान में उतरी थी.

आजादी से पहले और आजादी के बाद की पत्रकारिता

1857 से 1947 तक के नौ दशक लंबे संघर्ष की कहानी हिंदी पत्रकारिता की चर्चा किए बिना पूरी नहीं हो सकती. क्रांतिकारियों और आज़ादी के नायकों ने अपनी बात कहने के लिए पत्रकारिता को अपना हथियार बनाया. महात्मा गांधी, तिलक, बोस, लाजपत राय, गणेश शंकर विद्यार्थी, गोखले और भगत सिंह जैसे अनगिन नाम हैं जिन्होंने पत्रकारिता को अपनाकर आज़ादी की आवाज़ को धार दी. आज जिस हिंदी को हम हिंदी कहते मानते हैं, उसका मानकीकरण और कसावट का काम भी हिंदी पत्रकारिता की ही देन है और खास बात यह है कि हिंदी पर यह उपकार अहिन्दी भाषी संपादकों ने किया. गोविंद रघुनाथ थत्ते, सखाराम गणेश देउसकर बाबू राव विष्णु पराड़कर, लक्ष्मी नारायण गर्दे, रघुनाथ खाडिलकर आदि वो संपादक थे, जिन्होंने हिन्दी पत्रकारिता की चौहद्दी गढ़ी. इसके बाद वर्ष 1900 में इलाहाबाद से सरस्वती छपी. पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी इसके संपादक थे. इस पत्रिका और प्रयास ने ही हिंदी को एक मानकीकृत स्वरूप दिया, व्याकरण से लेकर वाक्य विन्यास तक उसे कसावट और सुघड़ता दी.

आज़ादी के संघर्ष के समय की पत्रकारिता दरअसल, साहित्य की, समाज सुधार की और अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की पत्रकारिता थी. लेकिन समाज जैसे-जैसे बदलता है, उसकी इच्छाओं के केंद्रीय तत्व बदलते हैं, पत्रकारिता में भी उसका प्रभाव दिखता है. इसलिए आज़ादी के बाद की पत्रकारिता एक बदलते हुए भारत की पत्रकारिता थी. उसे नया भारत गढ़ना था. शिक्षा, स्वास्थ्य, संसाधनों की बातें करनी थीं. राजनीति और लोकतंत्र को ताक़त देनी थी. संवैधानिक मूल्यों को समाज में प्रसारित और स्थापित करना था. अब लड़ाई अंग्रेज़ों से नहीं थी, कुरीतियों, गैर-बराबरी और पिछड़ेपन से थी. जैसे-जैसे देश बनता गया, संचार के लिए अख़बार और पत्रिकाएं एक मज़बूत माध्यम बनकर उभरे. साक्षरता ने इनके प्रसार को पंख दिए. देश सीख रहा था और पत्रकारिता इसे प्रसारित कर रही थी. तेज़ी से बनते-बदलते देश में पत्रकारिता ने दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, जातिवाद और सांप्रदायिकता जैसे विषयों पर भी काम किया.

आपातकाल था पत्रकारिता के लिए अग्निपरीक्षा

आज़ादी एक बड़ा परिवर्तन था. राष्ट्र निर्माण में पत्रकारिता की भूमिका बड़ी थी इसलिए उसकी ज़िम्मेदारी, तैयारी, कथावस्तु, विषय और सोच, सब बदले. तकनीक संसाधनों को आधुनिक करती जा रही थी. विश्व जुड़ रहा था क्योंकि संसाधन और तकनीक काफी प्रगति कर चुकी थी. इसका लाभ और प्रभाव पत्रकारिता को भी मिला. लोकतंत्र भी एक बड़ा परिवर्तन था. इसने भी पत्रकारिता को बदला. राजनीति पत्रकारिता का केंद्रीय विषय बना. सरकार को सुनना, सरकार से पूछना, सरकार से जूझना पत्रकारिता का पहला पन्ना बन चुका था. संसाधन बढ़े तो विषयबद्ध पत्रकारिता को भी तरजीह मिली. महिलाओं की पत्रिकाएं, बच्चों की पत्रिकाएं, विज्ञान और साहित्य की पत्रिकाएं, अकादमिक और संस्थानों की पत्रिकाएं. शोध और बाज़ार की पत्रिकाएं, मनोरंजन, खेल, अर्थ, रक्षा, लाइफ़स्टाइल और फैशन तक के विषयों पर पत्र-पत्रिकाएं आने लगे. इनका पाठक वर्ग खड़ा हुआ. इस पाठक वर्ग में बाज़ार के लिए संभावनाएं थीं. इसलिए पत्रकारिता अब योजक बनकर बाज़ार और उपभोक्ता को जोड़ने का माध्यम भी बनी.

आपातकाल का समय पत्रकारिता के लिए अग्निपरीक्षा का समय साबित हुआ. एक तरफ़ लिखने की दीवानगी थी, अभिव्यक्ति के अधिकार के संवैधानिक वचन को बचाए रखने की प्रतिबद्धता थी और दूसरी ओर सरकारी दमन था. इस दमन में भी हिंदी पत्रकारिता ने अपनी कलम को कमज़ोर नहीं पड़ने दिया. आपातकाल लाने वाले उखड़ गए और पत्रकारिता पर हुए तब के हमले को वो काले टीके की तरह आज भी ढो रहे हैं.

इस दौरान पढ़ने की पत्रकारिता को नए भाई बहन मिल गए थे. तकनीक ने रेडियो और फिर टीवी के ज़रिए सुनकर और देखकर सूचनाओं से अवगत होने का साधन जनता को दे दिया था. ये आकाशवाणी है और दूरदर्शन समाचार से हम जुड़े और पत्रकारिता को प्रसार के नए आयाम मिलते गए. 21वीं सदी की शुरुआत इंटरनेट युग की शुरुआत भी है. यहां से पत्रकारिता को नया वेब पता मिला और आज सोशल मीडिया से लेकर व्हाट्सएप चैनलों तक ये अपने पांव पसार चुकी है.

कैसे टूटती चली गई हिंदी भाषा?

1991 के नव उदारीकरण ने जब बाज़ार को खोला तो विज्ञापन और विज्ञापनदाता, दोनों बहुत मज़बूत होकर उभरे. ये पत्रकारिता के लिए फलने-फूलने का अवसर भी बना और पतित होने की आपदा भी. पत्रकारिता संस्थानों में संपादकीय के समानांतर मैनेजरी और मेनेजमेंट खड़े हो गए. कहीं-कहीं अधिक शक्तिशाली भी हो गए और इसका असर कंटेंट पर पड़ा. राजनीति और सरकारों ने भी नैरेटिव को नियंत्रित करने के लिए पत्रकारिता को हर संभव तरीके से नियंत्रित करने की कोशिशें कीं. इन सब का प्रभाव पत्रकारिता पर पड़ा. निजी चैनलों की आमद से खबरों का लोकतांत्रिक कैनवास तो बना. लेकिन फिर जीत की होड़ ने चैनलों को खबरों से भटकाया भी. इससे भाषा टूटी, विषय छूटे, शोर बढ़ा, लोकप्रियता के लिए सस्तापन आया, तमाशे ने गंभीरता को हर लिया और न्यूज़रूम नाटकीयता का मंच बनते गए.

इंटरनेट की मजबूती ने प्रसार को आसान तो किया लेकिन उससे बड़ा काम किया सूचनाओं का लोकतांत्रिक करण करना. इससे समानांतर मीडिया खड़ा होने लगा. लोगों को अपनी बात और सूचनाएं कहने, दिखाने की आज़ादी मिली. लेकिन इसी आज़ादी ने एक अजीब से सूचना कीचड़ में हमें उठाकर फेंक दिया है. आज फेकन्यूज़ का बोलबाला है. यूट्यूब पर चैनलों की तादाद लाखों में है. लोग बिना तथ्यों को जाने परखे कुछ भी बता दिखा रहे हैं. भाषा पर, शैली और व्याकरण पर भी इसका असर है और यहीं से हम आज की हिंदी पत्रकारिता की चुनौतियों को भी समझ सकते हैं.

हिंदी पत्रकारिता की दो चुनौतियां

हिंदी पत्रकारिता की चुनौतियां दो दायरों में हैं. पहली है हिंदी की चुनौतियां और दूसरी है पत्रकारिता की चुनौतियां. तेज़ी से बदलते समय में भाषा एक नए संकट से जूझ रही है और इसका प्रभाव भविष्य की पत्रकारिता पर भी पड़ेगा. यह संकट है मानकीकरण का संकट. लोगों के पास आज शब्द कम होते जा रहे हैं जबकि कहने के साधन प्रचुर हैं. जो कहा जा रहा है, वो भाषा का टूटा और मिलावटी स्वरूप है. नए शब्दों को गढ़ने की जगह आयातित शब्दों पर निर्भरता बढ़ी है. भाषा के बनने के क्रम में बाहर से शब्द आते हैं और आने चाहिए. लेकिन इससे भाषा को टूटने और बिखरने से बचाना भी होता है जो अब होता नज़र नहीं आ रहा.

साक्षरता ऐतिहासिक स्तर पर है लेकिन लिखने वालों का अभाव है. सही लिखना, अच्छा लिखना और सधा हुआ लिखना पत्रकारिता की ज़रूरत है जो अब कम होती जा रही है. वर्तनी की गलतियां लिखते समय की गलती नहीं हैं, वो अज्ञानता और अधूरेपन की निशानी हैं. मल्टीमीडिया ने संवाद और संप्रेषण को लिपि की निर्भरता से मुक्त सा कर दिया है इसकी वजह से भी लिखना और सही लिखना अब कमज़ोर पड़ा है. यह चिंताजनक है.

दूसरी समस्या है हिंदी की हीनता. यह हिंदी पत्रकारिता में भी दिखती है. हिंदी का समाज अभी भी भाषा को लेकर एक गर्वित और स्वाभिमानी समाज नहीं बन सका है. हिंदी अपनों की भाषा से ज्यादा बाज़ार की भाषा बनकर रह गई है. उपभोक्तावाद ने हिंदी को बाज़ार फैलाने का माध्यम तो बनाया लेकिन उसे जो सम्मान और स्वाभिमान मिलना था, वो आज भी मिल नहीं सका है. नतीजा यह है कि हिंदी के पत्रकारों का पारिश्रमिक भी अंग्रेज़ी के पत्रकारों से कम है. इससे उलट मलयालम, तमिल, मराठी और बांग्ला के पत्रकारों में आप भाषायी स्वाभिमान अधिक मज़बूत और प्रभावी पाएंगे.

चुनौती कहने की भी है. सत्ता और समाज के बीच शक्ति का संतुलन बिगड़ा है. सत्ताएं और ताक़तवर होती गई. समाज विचारधाराओं से भटककर अब फैशनेबुल क्रांति की ओर जा चुका है. विचार की जगह प्रतिक्रिया हावी है. प्रतिक्रिया भी ज़मीन छोड़कर आभासी संसार में सोशल मीडिया तक सीमित है. ऐसे में पत्रकारिता और चुनौतीपूर्ण होती जा रही है. न्यूज़ पढ़ने-देखने के तरीकों पर जो अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट आ रही हैं, उनके अनुसार दुनियाभर में समाचार माध्यमों की क्रेडिबिलिटी घटी है. लोगों का समाचारों से मोहभंग हो रहा है और इसकी वजह से न्यूज़ पढ़ने-देखने वालों की तादाद कम होती जा रही है. इसलिए विश्वसनीयता का संकट, भरोसे का संकट भी एक चुनौती है जिसे पत्रकारिता करने वालों को गंभीरता से लेना होगा. दो सौ वर्ष में हम यहां पहुंच गए.

AI ख़ुद में एक चुनौती

सोशल मीडिया अब समाचारों और सूचनाओं के प्रसार की नई और पहली पसंद बनता जा रहा है. वहां नैरेटिव संस्थागत न होकर व्यक्ति आधारित है. इससे विश्वसनीयता का संकट और बढ़ा है. फेंक न्यूज़ का समुद्र तैयार होता जा रहा है. इसको नियंत्रित करने की कोशिशें बौनी साबित हुई हैं. समाचार दिखाने और बताने के क्रम में जिन बातों को ध्यान रखना आवश्यक था, जिन नैतिक मानदंडों का पालन अनिवार्य था, वो अब लुप्त होता जा रहा है. गहराई खत्म हो रही है. हर तरफ़ हल्कापन और सतही बातें बताकर निकल जाने की तेज़ी दिखती है. समाचारों को डिकोड करना, विस्तार देना, ज़मीन पर पड़ताल करना, समझाना और लोगों को उसके दूसरे पहलुओं से अवगत कराने की परंपरा कमज़ोर पड़ी है.

एआई यानी आर्टीफीशियल इंटैलिजेंस ख़ुद में एक चुनौती है. अभी ये माध्यम परिपक्व नहीं हुआ है. लेकिन इसकी मदद से समाचार बन रहे हैं. क्षेत्रीय भाषाओं में इनकी वजह से भाषा का संतुलन हिल गया है. तथ्यों में एआई लगातार बड़ी गलतियां कर रहा है. लेकिन पैसे और साधन बचाने के क्रम में इसे बढ़ावा दिया जा रहा है. पत्रकारिता संस्थानों को यह भी सोचना होगा कि एआई को एक टूल की तरह ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए, उसे संपादक नहीं बना देना चाहिए. ऐसा करना बड़ी भूल होगी.

कमज़ोर हो रही है संस्थागत पत्रकारिता

इस सब के दौरान चुनौती समाज ख़ुद बनता जा रहा है. सूचनाओं का अपच हर तरफ है. लोगों ने बात करना और बोलना मिलना कम कर दिया है. एक ही टेबल पर परिवार के लोग खाना खाते हुए भी फ़ोन पर ही लगे हैं. रील्स की दुनिया, वीडियोज़ लोगों को एक अलग संसार में लेकर जा रहे हैं जहां लत की तरह हम सोशल मीडिया की चपेट में हैं. इससे समाचार माध्यमों पर जाने और वहां से सूचना पाने की भूख खत्म होती जा रही है और यह पत्रकारिता के सामने एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है. प्रसार सिमट रहा है. कमाई पर भी असर है और इसलिए संस्थागत पत्रकारिता कमज़ोर हो रही है. पत्रकारिता के नाम पर नजाने कौन-कौन से तत्व समाज में मौजूद है. ऐसे लोग ज्यादा दो सौ साल का समारोह मना रहें हैं.

दो सौ बरस की इस यात्रा में पत्रकारिता एक बच्चे की तरह निर्मल और निश्छल पैदा हुई. लेकिन आयु के साथ व्याधियां आती हैं और आईं भी. जो मार्तंड कभी उदंत था, आज नई चुनौतियों के बादल उसे घेरे हैं. यह चिंतित करता है. बेचैन करता है. लेकिन नाउम्मीद नहीं करता क्योंकि सूरज को तो निकलना ही है. ग्रहण कबतक सत्य को छुपाएगा. मैं उदंत की इस वंशावली और दो शताब्दियों की यात्रा के संघर्ष को देखकर विश्वास से कह सकता हूं कि हमारे बीज अच्छे हैं, हम फिर से हरे होंगे. हिंदी का और भारत का समाज, संघर्ष में संभावनाओं को जन्म देने वाला समाज है. यह घटाटोप बहुत समय टिकेगा नहीं. सूरज को निकलना ही है. पत्रकारिता अपने अतीत, अस्तित्व और उम्मीदों के अनुरूप करवट ज़रूर लेगी. इसका स्वरूप क्या होगा, कैसे होगा, यह तो ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता. लेकिन तत्व क्या होंगे, यह साफ़ है और तत्व वही हैं, जो उदंत बो कर गया है.

About Uma Shankar

Uma Shankar writes about finance, business, and investment topics. He simplifies complex subjects like stock market, banking, tax, and cryptocurrency to help readers make informed financial decisions. Data-driven reporting is his strength.

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